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Tuesday, 27 December 2016

सुविधाहीन बच्चों के प्रथम सम्पूर्ण निर्माण शिविर के अन्य संस्मरण (1)

सुविधाविहीन बच्चों के प्रथम सम्पूर्ण निर्माण शिविर (2006-07) के अन्य संस्मरण (1)

पी के सिद्धार्थ
अध्यक्ष, भारतीय सुराज दल

शिविर, जिसके दो बच्चों की चर्चा मैं कर चुका, की शुरुआत चिल्ड्रेन्स एन्थम या बाल गीत से की गयी। वह गीत कुछ इस प्रकार से था :

एफिल टावर कैसे बनते
लोहे से, इस्पात से?
नहीं-नहीं ये बनते हैं
कुछ करने के जज़्बात से।

ताजमहल कैसे बनते संग-
मरमर से पाषाण से?
नहीं-नहीं, नहीं-नहीं,
ये बनते हैं मेहनत से,
कल्पनाशक्ति-संधान से।

गोल्डन टेम्पल कैसे बनते,
सोने से, चट्टान से?
नहीं-नहीं ये बनते हैं,
भावना और बलिदान से।

सैटेलाइट कैसे बनते,
कलपुर्जों की शान से?
नहीं-नहीं ये बनते हैं,
इच्छाशक्ति और ज्ञान से।

इच्छाशक्ति, बुद्धि, कल्पना,
मेहनत और लगन ये,
धन से नहीं खरीदी जातीं,
उठती अंतर्मन से।

इन्हीं शक्तियों से देंगे हम
मोड़ समय की धारा,
जिससे बढ़ कर विश्वजयी हो,
हिंदुस्तान हमारा।

बच्चों को मैंने बताया कि प्रकृति-प्रदत्त बुद्धि या आई-क्यु चाहे जितनी भी हो, उसे बहुत अधिक बढ़ाया नहीं जा सकता। मगर भावना को बहुत बढ़ाया जा सकता है। बुद्धि और भावना को मिला कर ही जीवन में सफलता की मात्रा निर्धारित होती है। प्रकृति ने अगर आई-क्यु 100 में 10 दी है और भावना भी  100 में 10  तो कुल सफलता साधारणतः 20 ही होगी। प्रकृति-प्रदत्त आई-क्यू को 10 से बढ़ा कर 15 किया जा सकता है, मगर शायद उससे अधिक नहीं। मगर भावना को बढ़ा कर 10 दे 90 भी किया जा सकता है। तब सफलता होगी 15 (बुद्धि) plus 90 (भावना) अर्थात 105. इसलिए ऊँचा उठने की भावना विकसित करने पर ध्यान दें। खूब लगन की भावना से पढ़ें, और जादू देखें।

अगर एफिल टावर लोहे और इस्पात से बनते तो सबसे पहले कहाँ बनते, यह प्रश्न बच्चों से पूछा गया।
बच्चे चुप रहे।
मैंने कहा, भारत के झारखण्ड-ओडिसा मे, क्योंकि वैसा बढ़िया इस्पात तो यहीं पाया जाता है, फ़्रांस में नहीं। मगर यह तो एफिल नमक इंजिनियर के जज्बात थे, भावना थी कि वह दुनिया का सबसे ऊँचा टावर बना कर दिखा देगा, जिसने दुनिया का सबसे ऊँचा टावर फ़्रांस में सचमुच खड़ा कर दिया।

गोल्डन टेम्पल जब सिख्खों ने बनाना शुरू किया तो आक्रमणकारियों ने उसे 7 बार तोड़ा और हर बार सिखों का कतल किया। मगर सिक्खों ने बलिदान देकर भी हर बार एक नया बेहतर टेम्पल खड़ा किया। आज सोने से मढ़ा हुआ गोल्डन टेम्पल दुनिया के सुन्दरतम मंदिरों में एक है। यह सिख्खों की भावना और उनके बलिदान का प्रतीक है। बहुत बड़ी उपलब्धियां विरले ही बिना उत्कट भावना और बलिदान के प्राप्त होती हैं।

बच्चों को यह भी बताया गया कि भावनाएं बाजार में नहीं मिलतीं बल्कि हमारे अंतर्मन में रहती हैं। इसलिए उन सभी को सुलभ हैं।

बच्चों ने बड़े ध्यान से इन बातों को सुना और गुना! मुझे नहीं पता था कि आने वाले हफ़्तों में इन बच्चों की भावना भी प्रज्वलित हो कर एक नया रंग दिखलाने वाली थी। (क्रमशः)

पी के सिद्धार्थ
8252667070
www.pksiddharth.in
27 दिसंबर, 2016

Sunday, 25 December 2016

मेरा प्रिय छात्र अमरजीत

मेरा प्रिय छात्र अमरजीत

पी के सिद्धार्थ
अध्यक्ष, भारतीय सुराज दल

सुविधाविहीन बच्चों के इस सम्पूर्ण निर्माण शिविर ने मुझे  यह अनुभव दिया कि एक चौथाई बच्चे बेहद मेधावी थे और एक चौथाई बेहद मंदबुद्धि। बाकी औसत बुद्धि के थे। बेहद मेधावी बच्चों में एक था अमरजीत कुमार। इस बच्चे पर शिविर शुरू होने पर मेरी पहली विशेष नज़र तब पड़ी जब मैंने दूसरे ही दिन सुबह शिविर में जाने पर यह पाया कि अमरजीत नाम का एक बच्चा अनुपस्थित था। फिर जब बच्चों के पास दिन के भोजन में शरीक होने आया तो मैंने उसे बुला कर जवाब तलब किया कि वह कहाँ गायब हो गया था। उसने तब मुझे बताया कि वह सुबह 4 बजे से 7 बजे तक अख़बार बांटता था, और अपने परिवार के लिए रोजी-रोटी जुटाता था। उसके पिता भी यही काम करते थे, यानि पेपर भेंडर थे। बड़ा परिवार था, और माता-पिता के अलावा एक छोटा भाई और चार बहनें थीं। इसलिए अगर महीना भर उसने अख़बार बांटना छोड़ दिया तो घर का खर्च चलाना मुश्किल हो जा सकता था। इसलिए उसने मुझसे रोज सुबह तीन से साढ़े तीन घंटे अनुपस्थित रहने की छूट मांगी।

मेरे पास उसकी पूरी जुबानी सुनने के बाद इसके सिवा कोई चारा नहीं बचा कि मैं उसे अनुमति दूँ। मगर यह मेरी कल्पना के बाहर था कि इतना छोटा बच्चा पेपर भेन्डिंग का काम कर घर का खर्च चलाने में अपने पिता की मदद करे। लेकिन सच्चाई यही थी। मुझे बाल श्रम क़ानून के सन्दर्भ में हुई न्यायमूर्ति सावंत से वार्ता याद आ गयी कि हम पश्चिमी देशों के विचारों और कानूनों की अंधाधुंध नक़ल बिना अपने देश की जमीनी सच्चाई का आकलन किये करते जा रहे हैं। न्यायमूर्ति सावंत के विचार में भारतीय बाल श्रमिक कानून भी अव्यवहारिक था, क्योंकि बहुतेरे गरीब परिवारों में 14 साल से कम के बच्चे बाल-श्रमिक बन दो शाम की रोटी जुटाने में मदद करते हैं। अमरजीत इसका एक उदहारण था। लेकिन अभी मेरे दिमाग में कानून कम और शिक्षा अधिक सक्रिय थी।

अमरजीत की विशेषता यह थी कि वह 3-4 घंटे अनुपस्थित रह कर भी सबसे आगे चल रहे बच्चों की पंक्ति में था, और अगर उसे पूरा समय बाकी बच्चों की तरह मिला होता तो वह तौसीफ से पीछे नहीं रहता।

इस बच्चे की दूसरी विशेषता यह थी कि उसे अपने जीवन से कोई शिकायत नहीं थी, और वह हमेशा प्रसन्नचित्त रहता था। अपनी साइकिल वह शिविर में ही रखता था, और वहीँ से जाकर अख़बार उठा कर घर-घर बाँट कर ख़ुशी-ख़ुशी शिविर में आकर पढ़ने में लग जाता था। यह उसके जीवन की परिस्थितियों के बीच एक विरल चीज़ थी।

मैंने बाद में दिल्ली में 5 राज्यों के बच्चों का जब 10 दिनों का एक सम्पूर्ण निर्माण शिविर लगाया तो अमरजीत को उसमे भी आमंत्रित किया। वहां उसे अख़बार बेचने के लिए समय बिताने की जरुरत नहीं थी, इसलिए कई राज्यों के लगभग 120  बच्चों के बीच वह प्रथम आया।

मैं यह दावे के साथ कह सकता हूँ कि शिविर के 4-5 बच्चे इतने मेधावी थे कि अगर वे किसी सुविधासंपन्न घर में पैदा हुए होते तो आई आई टी-जैसी परीक्षाएं आसानी से निकाल लेते। अथवा अगर देश की शिक्षा-व्यवस्था इस प्रकार की होती कि सारे ऐसे मेधावी बच्चों को अलग कर उनके लिए बेहतर शिक्षा की व्यवस्था कर पाती तो भी यह संभव हो पाता।

पी के सिद्धार्थ
8252667070
pradeep.k.siddharth@gmail.com
www.pksiddharth.in

Friday, 9 December 2016

Maneater of Mantu Part 3

द मैन ईटर ऑफ़ मनातू : भाग 3
मैन-ईटर टर्न्स मैन-बेनीफैक्टर
नर-भक्षी बना नर-हितकारी

पी के सिद्धार्थ
अध्यक्ष, भारतीय सुराज दल

जब मउआर ने मेरे टेबुल पर अपना कागज फैलाया तो मैंने पाया कि यह गांवों का नक्शा था। मेरा आधा टेबुल उस नक़्शे से भर गया। देवव्रत जी ने भी उस नक़्शे को हैरत से देखा।

"देखिये सिद्धार्थ साहब, यह नक्शा। मेरे अधिकार में 5000 एकड़ जमीन है", कह कर मउआर ने मुझे वे गांव दिखाना शुरू किया जहाँ-जहाँ वे जमीनें थीं। फिर उन्होंने कहा, "ये पाँच हज़ार एकड़ जमीनें मैं आपको देता हूँ। आप जिसे चाहिए दे दीजिये। मुझे यकीन है, आप सही लोगों को देंगे।"

"शुक्रिया मउआर साहब। मगर यदि आपने ये जमीनें गरीबों में खुद बाँट दी होतीं तो नक्सलवादी आपके पीछे इस कदर हाथ धो कर नहीं पड़े होते", मैंने कहा।

"मुझसे मेरी सम्पति कोई जबरदस्ती बंदूक दिखा कर नहीं ले सकता। उसी की कोशिश ये करते रहे हैं", मउआर ने कहा।

मैंने मउआर साहब को चाय पिलाई और कुछ देर की चर्चा के बाद ससम्मान विदा किया। उन्हें छोड़ने बाहरी द्वार तक आया। लौट कर कलक्टर साहिबा को फोन लगाया, और उन्हें उस बात की सूचना देते हुए यह आग्रह किया कि वे जमीनों को गरीबों-भूमिहीनों में तुरंत बंटवाने के लिए आवश्यक कार्रवाई करें। इससे नक्सलवाद के नियंत्रण में मदद मिलेगी। मोहतरमा ने कहा कि उनके पास जमीन की शिनाख्त और माप-तौल करने वाले कर्मियों की बहुत कमी थी, और यह काम तुरंत होने की कोई गुंजाइश नहीं थी। इतनी जमीन बांटने में 5 से 10 साल लग सकते थे।

मैं निराश नहीं हुआ। मैंने स्वयंसेवी संस्थाओं की एक बड़ी गोष्ठी बुलाई और उन्हें यह दायित्व दिया कि वे भूमिहीन लाभुकों का चयन कर उन्हें इन जमीनों पर काबिज करें। स्थानीय थानेदारों को इसमें मदद करने का निर्देश दिया कि इस प्रक्रिया की निगरानी करें और सहयोग करें।

चूँकि यह सारी घटना एक पत्रकार के सामने घटित हुई इसलिए अगले दिन मउआर के इस स्वैच्छिक भूमि-दान की खबर अख़बारों में सुर्ख़ियों में आई जिसका नक्सलवादियों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा। बाद में जब एक बड़े नक्सलवादी नेता श्री कामेश्वर बैठा संसद सदस्य बने और 20 वर्षों बाद उनसे पलामू सर्किट हाउस में उनसे पहली बार मुलाकात हुई तो उन्होंने इस जमीन वितरण का हवाला देते हुए बताया की उस वक्त उनके नक्सली साथियों ने आकर उनके सामने बंदूकें पटक दी थीं, यह कहते हुए कि अब बन्दूक उठाने की क्या जरुरत है जब प्रशासन खुद वे ही काम करने लगा है जिसके लिए वे लड़ रहे थे। तब बैठा जी ने उन्हें यह बुद्धि दी थी कि यह चार दिनों की चांदनी है, और कुछ दिनों बाद सारा मामला यथावत हो जायेगा।

बाद में कलक्टर महोदया ने मेरी ए सी आर में यह प्रतिकूल टिपण्णी लिखी कि श्री सिद्धार्थ रेवेन्यू कानून नहीं जानते, और अपना काम छोड़ कर रेवेन्यू मममलों में अनावश्यक हस्तक्षेप करते रहते हैं, और लोगों को जमीन बांटने जैसे काम करते हैं जो उनका काम नहीं है।

लेकिन इस प्रसंग ने मेरी उस धारणा की पुष्टि की कि हर मनुष्य के भीतर गहरे कहीं अच्छाई और दिव्यता होती ही है, जिसके जग जाने पर वह दानव से देव बन सकता है। दुमका में हज़ारों सालों से अपराध को अपना पेशा बना कर रखने वाले एक क्रिमिनल ट्राइब के साथ किये गए मेरे पूर्व के प्रयोगों ने इसे पहले ही सिद्ध किया था।

पी के सिद्धार्थ
8252667070

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