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Friday, 23 December 2016

मेरा प्रिय छात्र तौसीफ भाग 2

मेरा प्रिय छात्र तौसीफ (भाग 2)

पी के सिद्धार्थ
अध्यक्ष, भारतीय सुराज दल

इस प्रकार उच्चाधिकारी की सिफारिश पर तौसीफ मेरे शिक्षा-शिविर में प्रवेश कर गया।

शिक्षा-शिविर एक महीना लंबा था और ऐकडेमिक्स के नजरिये से घटनापूर्ण था। इसका विवरण एक छोटे-से उपन्यास का रूप ले सकता है। इसलिए विवरणों में न जाते हुए मैं तौसीफ पर ध्यान केंद्रित करना चाहूँगा।

मैंने कैम्प के दस्तावेजीकरण के लिए शिविर के पहले दिन तीन अलग-अलग स्वतंत्र मूल्यांकन टीमें बुलाई थीं। उनमें एक थी स्थानीय मीडिया की टीम। इसमें 22 या 24 अख़बारों और टी वी चैनलों के लोग थे। स्थान था एच ई सी का गेस्ट हाउस। मैंने मीडिया वालों को कहा कि आप लोग बच्चों से बात-चीत कर इनके विचारात्मक स्तर या कॉन्सेप्ट-फॉर्मेशन, आत्म-विश्वास, सम्प्रेषण-क्षमता, हिंदी-अंग्रेजी लिखने-बोलने की कुशलता आदि का अपनी और से मूल्यांकन करें। फिर शिविर शेष होने पर एक बार फिर से इनसे मुलाकात करें, और एक बार फिर देखें कि एक महीने में क्या फर्क पड़ा।

मीडियाकर्मियों ने बच्चों से बात-चीत कर अपनी ओर से इनका आकलन किया। फिर वे चले गए।

शिविर शुरू हुआ। जो बच्चे शिविर में आये थे, उनमें से अधिकांश पढ़ने-लिखने वाले बच्चे नहीं थे, ऐसा उनके शिक्षकों ने बताया। ये घूमने-फिरने वाले, मौज़ मस्ती करने वाले बच्चे थे। अनेकों एन सी सी के कैम्प कर चुके बच्चे थे, जो शायद फिर से एक कैम्प की मस्ती लूटने आए थे।

मगर जल्द ही बच्चों ने पढ़ाई में गति पकड़नी शुरू की। उनमे सबसे शांत तौसीफ था जो कभी बिना पूछे एक शब्द नहीं बोलता था।

मैं अपने कार्यालय से लौटने के बाद, अक्सर रात के भोजन के उपरांत, बच्चों को रात एक-दो बजे तक पढ़ाता था, और बच्चों की रात में ही नियमित परीक्षा भी लिया करता था। सुबह ऑफिस जाने के पूर्व भी देखता था, और दिन का भोजन भी बच्चों के साथ करता था। अलग-अलग चीजों के लिए नित्य प्रथम-द्वितीय-तृतीय आने के प्रमाणपत्र भी दिया करता था। इन प्रमाण-पत्र नामक कागज के टुकड़ों के लिए बच्चों में जबरदस्त होड़ लगा करती थी, और वे कभी-कभी रात भर जग कर पढ़ा करते थे। बाद में इनका सोना सुनिश्चित करने के लिए मुझे गार्ड बुलाने करने पड़े। बच्चे काफी उत्साह और उत्तेजना में रहा करते थे। मगर तौसीफ न तो कभी उत्तेजित दिखा, न उत्साहित या हतोत्साहित, बल्कि शांत भाव से अपना दिया हुआ काम करता रहा।

जल्द ही मैंने पाया कि अंग्रेजी की परीक्षाओं में तौसीफ सातवीं-आठवीं- नवीं के बच्चों के मेधावी बच्चों को भी पीछे छोड़ने लगा। उस 22 बच्चों के समूह में 4 या 5 बच्चे अत्यंत मेधावी थे। मगर वे छठी कक्षा के इस मूक बालक से पार नहीं पा रहे थे। अंत में शिविर समाप्त हुआ और एक सार्वजनिक समारोह कर उन्हीं मिडिया-कर्मियों को फिर उन बच्चों के आकलन के लिए बुलाया गया।

एक संक्षिप्त परिचयात्मक भाषण के बाद बच्चों की सार्वजानिक तौर पर मीडिया के समक्ष परीक्षा ली जाने लगी।

परीक्षा लेने के लिए अंग्रेजी अख़बारों के पत्रकारों को ही मैंने आमंत्रित किया। उन्हें उन डेढ़ हज़ार शब्दों की सूची भी थमा दी गयी जिन्हें कैंप के दौरान बच्चों ने याद किया था। फोनेटिक्स से सम्बद्ध प्रश्नों को भी उन्हें दे दिया गया। उन्होंने प्रश्न पूछने शुरू किये।

जैसे ही दो-तीन बच्चों की अंग्रेजी की सार्वजनिक परीक्षा खत्म हुई, तौसीफ न नंबर आ गया। पिछले बच्चों ने गलतियां तो न के बराबर ही की थीं, मगर बीच-बीच में कभी-कभी सोच कर बोलते थे, क्यों कि यहाँ काफी भीड़ थी और ढेर सारे कैमरे लगे हुए थे। इस तरह के माहौल में तो अच्छे-खासे लोग भी नर्वस हो जाते। मगर जब तौसीफ की परीक्षा शुरू हुई तो तौसीफ को किसी भी सवाल के जवाब में एक क्षण भी सोचना नहीं पड़ा। वह बलकुल बिना नर्वस हुए सारे सरल या कठिन सवालों का जवाब बिना जरा भी ठहरे देता चला गया। सारे अंग्रेजी शब्दों की स्पेलिंग, उच्चारण, अर्थ उसने सही बताये, और सभी फ़ोनेटिक सिंबल्स की ध्वनियाँ सही निकालीं।

मीडिया एकदम से सकते में आ गयी और उसने 10 मिनट के भीतर अपना धीरज खो दिया। अरफा-तरफी का माहौल हो गया। अख़बार वाले और टी वी चैनेल वाले खींच-खींच कर बच्चों को प्रांगण में इधर-उधर ले जाने लगे और उनका साक्षात्कार और 'बाइट्स' लेने लगे। मैं और बाकी शिक्षक-शिक्षिकाएं जिनमे विनीता, श्रीमती सुजाता गुप्ता और खुद मैं भी शामिल था, भुला दिए  गए। जब उन्हें याद आया कि इस पूरे उपक्रम में हम लोगों की भी भूमिका थी, तो पत्रकारों ने थोडा रुक कर मुझसे भी बात-चीत करने का कोरम पूरा किया।

उन्होंने यह पूछा कि यह 'मिरेकल' कैसे हुआ। अन्य ने पूछा कि क्या ऐसा 'असंभव' कार्य स्कूलों में हमारी पद्धति से नहीं हो सकता?

मैंने कहा कि यह कोई मिरेकल नहीं है : कुछ तो युगों से स्थापित सामान्य शिक्षण-सिद्धांत हैं तथा  कुछ हमारे द्वारा विकसित नयी तकनिकियां ऐसे परिणाम सभी स्कूलों में उत्पन्न कर सकती हैं। लेकिन हम कोई सरकार तो नहीं जो व्यापक स्तर पर सभी सरकरी स्कूलों में ये प्रयोग लागू कर सकें। इसपर एक राष्ट्रीय अंग्रेजी अख़बार की पत्रकार ने जो गैरवाजिब  सवाल पूछा वह अभी तक मेरे जेहन में है : "क्या आप पत्रकारों के बच्चों के लिए एक शिविर आयोजित नहीं कर सकते?" मुझे मुस्कराते हुए  इस सवाल का जवाब टालना पड़ा।

जब मैं पत्रकारों से निवृत्त हो कर विनीता की ओर मुड़ा तो मैंने देखा कि उनकी आँखों से आंसू आ गए थे। मुझे पिछले महीने सुबह चार बजे की कपकपाती ठंढ में मेरी पाठशाला में प्रवेश के लिए व्याकुल तौसीफ की आँखों से ढलकते आंसू याद आ गए। गलती तो मेरी ही थी। जब मुझे लर्निंग-आउटकम पर भावना की उत्कटता के प्रभाव की जाँच करनी थी तो तौसीफ को छांटने की कोशिश नहीं करनी चाहिए थी, क्योंकि उसके आंसुओं से बढ़ कर उसकी भावना की उत्कटता का प्रमाण और क्या हो सकता था? अपनी नैसर्गिक प्रतिभा के अलावा उसकी तीव्र भावना ने उसे अपने से काफी ऊँची कक्षाओं के बच्चों को पीछे छोड़ने में मदद की थी। सभी बच्चों ने मिल कर सिद्ध कर दिया था कि भावना उत्कट हो और थोडा मार्गदर्शन और उत्साहवर्धन मिल जाये तो न केवल पढाई में बल्कि जीवन के किसी भी क्षेत्र में जीत प्राप्त करने से कोई रोक नहीं सकता।

शाम को दिल्ली और मुम्बई से फोन आ गए कि उनलोगों ने टी वी पर शिविर के बच्चों के अद्भुत प्रदर्शन का समाचार देखा। यानी देश भर में टी वी चैनलों ने इस शिविर का समाचार फ्लैश किया। अगले दिन सभी हिंदी-अंग्रेजी अख़बारों ने इस कैम्प के समाचार छापे, और कुछ प्रमुख अख़बारों ने तो हर एक बच्चे की तस्वीर तक छापी। इस प्रयोग ने देश के करोड़ों सुविधाविहीन और निर्धन बच्चों की अन्तर्निहित महान क्षमता पर मेरी आस्था दृढ कर दी।

पी के सिद्धार्थ
8252667070
pradeep.k.siddharth@gmail.com

Monday, 19 December 2016

शंकरन भाग 3

मेरे प्रिय आइ ए एस अधिकारी : एस आर शंकरन (भाग 3)

पी के सिद्धार्थ
अध्यक्ष, भारतीय सुराज दल

मुख्य सचिव किसी राज्य का सबसे व्यस्त अधिकारी होता है क्योंकि वह पूरे राज्य के प्रशासन का मुखिया होता है, और उसे सभी विभागों को देखना पड़ता है। कहना न होगा कि श्री शंकरन भी, स्वाभाविक रूप से, एक अत्यंत व्यस्त अधिकारी थे। लेकिन अपनी सारी व्यस्तताओं के बीच भी नए आईएएस अधिकारियों को भविष्य के लिए तैयार करना एक ऐसा विषय था जिसकी और उनका ध्यान हमेशा रहता था। वह अपने तरीके से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर उन्हें प्रशिक्षित करते रहते थे। आज के मुख्य सचिवों को न तो इसके लिए समय रहता है ना इसके लिए उनकी कोई प्रवृत्ति बनती है।

मुझे याद है कि एक बार राज्यभर के एसडीओ स्तर के अधिकारियों की एक गोष्ठी उन्होंने बुलाई थी। सुबह तड़के कैलाशहर से निकल कर साढ़े चार घंटे की यात्रा कर नए-नए एस डी ओ बने एक आई ए एस अधिकारी गोष्ठी में अगरतला साढ़े दस बजे दिन में पहुंचे। गोष्ठी से निवृत्त हो दिन का भोजन कर तुरंत  उत्तर त्रिपुरा जिले के मुख्यालय कैलाशहर की और अपनी जीप में लौट पड़े। कैलाशहर का रास्ता पहाड़ियों के बीच से घाटियों, जंगलों और घुमावदार सड़कों से होता हुआ निकलता था। जंगलों में वहां हाथी बहुत हुआ करते थे। कोई 'भला' मुख्य सचिव होता तो युवा अधिकारी को कहता कि थोडा शहर अगरतला में सिनेमा वगैरह देख कर कल सुबह चले जाना। मगर यहाँ तो मुख्य सचिव का फरमान था कि अपने कार्य क्षेत्र से मीटिंग के लिए आइए  और उलटे पांव वापस जाइये। कैलाशहर जाते हुए रास्ते में भूस्खलन के कारण एक पहाड़ ने गिरकर सड़क मार्ग अवरुद्ध कर रखा था, इसलिए एसडीओ साहब वहां से बीच में ही लौटकर अगरतला वापस आ गए। मुख्य सचिव को खबर मिलने पर वे गलत न समझ जाएं, इसलिए उन्हें फोन कर एस डी ओ साहब ने अगरतला में रात्रिविश्राम  की अनुमति मांगी। जवाब में मुख्य सचिव ने उन्हें यह कहा कि तुरंत वापस लौटें और भू-स्खलन की जगह जा कर तब तक खड़े रहें जब तक मिट्टी हटा कर सड़क खोल नहीं दी जाती।  युवा आई ए एस अधिकारी को उल्टे पांव वापस जाना पड़ा, और सड़क अवरोध के स्थल पर लगातार रात भर खड़े रहकर सम्बद्ध एजेंसियों को एकत्र कर उनके माध्यम से उन्हें सड़क का अवरोध दूर करा कर दूसरे दिन दोपहर मर आगे कैलाशहर की ओर बढ़ना पड़ा।अगर एस डी ओ साहब वहां रात भर खड़े होने का कष्ट नहीं करते, और दबाव दे कर रात भर पथ निर्माण विभाग और बोर्डर रोड संगठन आदि पर दबाव डाल कर कार्य नहीं कराते, तो सुबह तक सड़क नहीं खुल पातीं और अगले दो-तीन दिनों तक अगरतला देश से कटा रहता। लेकिन रात में पहड़ियों के बीच उस घने जंगल के मध्य में सड़क पर हाथियों का झुण्ड पहुँच जाता तो इस युवा अधिकारी की जान भी जा सकती थी। मगर शंकरन की यह सोच थी कि जान जोखिम में डालना सिर्फ सरहद पर सेना के जवानों का काम नहीं है, और आई ए एस अधिकारियों का काम सिर्फ मौज करना नहीं है। उन्हें भी लोक सेवा के लिए जोखिम उठाने के जरुरत होती है।

नौकरी से सेवानिवृत्त होने के बाद श्री शंकरन ने आंध्रप्रदेश में सामाजिक कार्यों में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे उन कुछ अधिकारियों में थे जिन्हें पीपुल्स वार ग्रुप ने बंदी बनाया था, लेकिन उन्हें नुकसान नहीं पहुंचाया। सफाई कर्मचारियों के एक बड़े आंदोलन का उन्होंने नेतृत्व आंध्र प्रदेश में किया।समूचे आंध्र प्रदेश में वे सभी के द्वारा समादृत रहे। भारत सरकार ने उन्हें पद्मभूषण से अलंकृत किया लेकिन यह पुरस्कार लेने से उन्होंने मना कर दिया। वे हमेशा एक निस्पृह कर्मयोगी रहे।

वे आंध्र काडर के थे और त्रिपुरा प्रतिनियुक्ति या डेपुटेशन पर आए थे। उनकी ईमानदारी की ख्याति सुनकर नृपेन चक्रवर्ती ने उन्हें त्रिपुरा में बुलाकर मुख्य सचिव बनाया था। इस प्रकार के ईमानदार और निर्भीक व्यक्ति को मुख्य सचिव बनाने का जोखिम सिवाय नृपेन दा के और कोई मुख्यमंत्री नहीं उठा सकता था। आज जब यह देश न केवल राजनेताओं बल्कि वरीय अधिकारियों के भ्रष्टाचार और कार्य संस्कृति के अभाव का पीड़ित है, शंकरन-जैसे आई ए एस अधिकारियों की कमी बहुत खटकती है। अब जब श्री शंकरन नहीं रहे, देश की ब्यूरोक्रेसी का इतिहास यह पूछता रहता है :  'कहां गए वे लोग'?

पी के सिद्धार्थ
20 दिसंबर, 2016
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Saturday, 17 December 2016

शंकरन (भाग 2)

मेरे प्रिय आइ ए एस अधिकारी : एस आर शंकरन (भाग 2)

पी के सिद्धार्थ
अध्यक्ष, भारतीय सुराज दल

आजकल जब नए आई ए एस प्रोबेशनर ज्वाइन करते हैं तो यह बातचीत करते सुने जाते हैं कि फलां मुख्य सचिव ने कितने करोड़ कमाए, कितने फ़ार्म हाउस कहाँ-कहाँ खरीदे। जाहिर है कि जब वरीय पदो पर ये प्रशिक्षु जाएंगे तो उन्हें ऐसे ही मुख्य सचिवों के पदचिंहों पर चलने की प्रेरणा मिलेगी। यही आज सर्वत्र घटित भी हो रहा है। अपवादों की बात अलग है। यही सामान्य मनोविज्ञान है। सरकार में भ्रष्टाचार और जन-निष्ठा हमेशा पानी की तरह ऊपर से नीचे की ओर प्रवाहित होते हैं।

मगर त्रिपुरा में यदि मुख्य सचिव के बारे में कोई चर्चा होती थी तो बस इतनी-सी कि वे कैसे कभी-कभी दो केले खा कर पर अपना लंच खत्म कर लेते थे, और कितनी सादगी से रहते थे। उनकी देखा-देखी और उनकी प्रेरणा से जिले के कई कलेक्टर भी दूरस्थ गांवों तक पैदल यात्रा करते थे, और वहां के आदिवासियों की समस्या और विकास के कार्यक्रमों के कार्यान्वन का जायजा स्वयं लेते थे।

जैसे राज्य के विधायकों और मंत्रियों में मुख्यमंत्री नृपेन चक्रवर्ती का खौफ रहता था, वैसे ही राज्य की सभी सेवाओं के अधिकारियों में मुख्य सचिव का खौफ रहा करता था। ध्यान रहे कि एक राजनेता या एक वरीय सरकारी अधिकारी का खौफ अपने अधीनस्थों पर तभी अच्छा होता है जब उसके साथ आदर की भावना भी जुड़ी होती है।अगर यह खौफ सिर्फ दंडात्मक कार्यवाही के कारण उत्पन्न होता है, तब उस तरह की प्रशासन-शैली पर कई तरह के प्रश्नचिह्न लगते हैं।

शंकरन का आदेश था कि कोई  अधिकारी लंच के लिए घर नहीं जाएगा, और कार्यालय में ही लंच करेगा। इस आदेश का सर्वत्र पालन होता था। शंकरन के बाद जो भी मुख्य सचिव आये, किसी के कर्यकाल में इसका पालन नहीं हुआ, हालाँकि सरकारी आदेश कागज पर वे ही थे, जबकि शंकरन के जाने के बाद भी कुछ दिनों तक नृपेन दा ही मुख्यमंत्री थे। अतः यह कार्यसंस्कृति सिर्फ नृपेन दा की नहीं बल्कि शंकरन की देन थी।

ऑफिस में खाने के आदेश के कारण मुझे भी घर से ही खाना लाना पड़ता था। मेरे खाने की डोलची कुछ विशेष होती थी, इसका मुझे कोई अहसास नहीं था। मगर कुछ ही दिनों में यह प्लास्टिक की जाली वाली बड़ी-सी नीली डोलची पुलिस मुख्यालय में, और सचिवालय में भी,  प्रसिद्ध  हो गयी, क्योंकि मेरी डोलची में थर्मस में सूप, जूस, और कई तरह के पकवान हुआ करते थे। मेरे कई वरीय साथी मेरे साथ लंच करने मेरे कमरे में आने लगे। उनकी छोटी-सी टिफिन बहुत सामान्य सी होती थी - दो-चार रोटियां और एक-आध सूखी भाजी। जल्द ही उन्होंने अपनी पत्नियों से शिकायत शुरू की, जिसके बाद पुलिस अधिकारियों की पत्नियों ने एक सभा बुला कर मेरी श्रीमती जी को बहुत नसीहतें दीं कि उनके द्वारा परंपराएं ख़राब की जा रही थीं। मगर मेरा लंच पूर्ववत 'संपचुअस' बना रहा। शंकरन के जाने से मुझे तात्कालिक फायदा यह हुआ कि मेरे मित्र अपने घर जा कर दिन का भोजन करने लगे (और थोडा दिन का आराम भी)। इससे मेरे 'टिफिन' पर उनका अतिक्रमण बंद हुआ, और मैंने फिर से अपने दिन के भोजन का निर्विघ्न आनंद उठाना शुरू किया। मगर मेरा फायदा भले हुआ हो, राज्य का नुकसान हुआ।

मुख्य सचिव का आदेश था कि कोई डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट या एसपी अपना जिला बिना उनकी अनुमति के नहीं छोड़ेगा। इस आदेश का पालन भी होता रहा मगर पूरी तरह नहीं। मैंने पाया कि मेरे जिले के युवा कलेक्टर और युवा एसपी अपनी पत्नियों के साथ बीच-बीच में छुपकर अगरतला निकल जाते थे सिनेमा देखने के लिए। साउथ डिस्ट्रिक्ट मुख्यालय से अगरतला सिर्फ एक-डेढ़ घंटे की दूरी पर था, इसलिए सिनेमा देख कर तुरत वापस जिला-मुख्यालय लौट आना संभव था। मगर वे यह सुनिश्चित करते थे कि उनकी गाड़ियां छुपे हुए स्थान पर पार्क हों ताकि मुख्य सचिव के संज्ञान में यह बात न आए।

मुख्यमंत्री नृपेंद्र दा और मुख्य सचिव श्री शंकरन में से कोई भी दबंग नहीं था, और कड़ी भाषा का प्रयोग नहीं करता था। दोनों मितभाषी थे। दोनों का समान आदर राज्य में था, और दोनों के खौफ के पीछे उनकी नैतिकता और उनके स्वच्छ चरित्र का बल था। देश में कहीं भी एक साथ ऐसा मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव नहीं हुआ होगा।

मुख्य सचिव को यह स्वतंत्रता मुख्यमंत्री ने दे रखी थी कि वह कोई भी निर्णय आवश्यकता पड़ने पर ले लें, और बाद में उस का अनुमोदन मुख्यमंत्री से करा लें। लेकिन इस स्वतंत्रता का दुरुपयोग कभी शंकरन साहब ने नहीं किया। सभी मंत्री मुख्य सचिव का बहुत लिहाज करते थे। सभी मंत्रियों को नृपेन दा का यह निर्देश था कि कभी मुख्य सचिव को अपने कमरे में न बुलाएं। कभी-कभी गोष्ठियों में जब मुख्यमंत्री एक हद पार कर जाते थे तो मुख्य सचिव उनको संभालकर रोक लेते थे और उनकी बात विनम्रता पूर्वक काट भी देते थे।

मैंने सुना कि आंध्र प्रदेश में एक बार शंकरन साहब ने सरकार के करोड़ों रुपए बिना सरकार की अनुमति के जल्दी-जल्दी में शायद अकाल जैसी स्थिति वाले जिलों के लिए बजट के एक मद से मोड़कर दूसरे मद में खर्च कर दी थी। यह कार्य अगर दूसरे किसी अधिकारी ने किया होता तो वह अपनी नौकरी खो बैठता। लेकिन क्योंकि यह कार्य जनहित के लिए स्थिति की तात्कालिकता को देख कर किया गया था, और सरकारी रेट टेप से बचने के लिए किया गया था, इसलिए उन पर कोई कार्यवाही नहीं की गई। ऐसा जोखिम भरा कार्य शंकरन साहब जैसा ईमानदार और संवेदनशील अधिकारी ही कर सकता था।

मुझे वह दृश्य आज तक याद है जब शंकरन साहब त्रिपुरा में अपना कार्यकाल पूरा होने पर सभी अनुमंडलों का भ्रमण कर रहे थे, और अपने अधिकारियों का धन्यवाद ज्ञापन कर रहे थे। इसी क्रम में वे सबरूम अनुमंडल में भी आए जहां पर मैं अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी था। डाकबंगले में हुई गोष्ठी में तब मैंने खड़े हो कर उनसे यह कहा था कि यह बहुत अन्यायपूर्ण है कि हम होमगार्डों से पुलिस के सिपाहियों जैसा बहुत सारा कार्य लेते हैं और उन्हें सिपाहियों की अपेक्षा बहुत कम पगार देते हैं। निश्चित रुप से होमगार्ड के सिपाही पुलिस के सिपाहियों का विकल्प नहीं हो सकते क्योंकि वे निशस्त्र हुआ करते हैं। लेकिन इन दोनों के वेतन में इतनी बड़ी खाई होना उचित नहीं था। उन्होंने मुझे देर तक देखा। वे बहुत बोलते नहीं थे।  लेकिन उन्होंने धीरे से कहा कि सरकार के पास इतने पैसे नहीं हैं कि वह इतनी बड़ी संख्या वाले होमगार्ड बल को बहुत अधिक पैसे दे सके। फिर भी वे देखेंगे कि क्या कर सकते हैं। स्थानांतरित हो चुका कोई मुख्यसचिव इतना बड़ा निर्णय लेने की स्थिति में नहीं होता। मगर जाने के पूर्व उन्होंने होमगार्ड का वेतन बढ़ाने के प्रस्ताव को कैबिनेट से पास करा कर चिठ्ठी प्रेषित करवा दी। गजब की विश्वसनीयता थी उनकी!

पी के सिद्धार्थ
17 दिसंबर, 2016
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Wednesday, 14 December 2016

राजेन्द्र सिंह के आश्रम में दी दिन : भाग 3

जलपुरुष राजेंद्र सिंह के तरुण भारत आश्रम में दो दिन : भाग 3

पी के सिद्धार्थ
अध्यक्ष, भारतीय सुराज दल

मैं लंच के लिए पहुंचा तो सब्जी निकाली। दूर से देखने में हरे बीन्स की सब्जी लगी। लेकिन जब नजदीक से देखा तो मोटी हरी मिर्च की सब्जी थी। मैं हैरान रह गया क्योंकि शुद्ध मिर्च की सब्जी कभी देखी-सुनी-खायी नहीं थी। मैंने आदर के साथ सब्जी को वापस उसके कंटेनर में रखा। राजस्थान की एक बड़ी विशेषता है वहां की मीठी तहजीब भरी जुबान। इतनी तीखी मिर्च खा कर इतनी मीठी जुबान! यह एक संयोग था, या कोई कार्य-कारण सम्बन्ध भी है? अगर है, तो मिर्च की सब्जी हरयाणा और बिहार के कुछ क्षेत्रों में भी खानी शुरू करनी चाहिए। फिर राजस्थान में बेरंग मरुभूमि क्षेत्र बहुत है। मगर वहां की पोशाक में अद्भुत रंग होते हैं। पहले दिन छत पर जब पहुंचा तो मुझे एकदम ललछौंह साफा (पगड़ी) पहनाया गया। मैं पहले से ही सवा छह फुट का हूँ। साफा पहन कर सात फुट का हो गया। ये तो पंजाब के लंबे-से इब्राहिम भाई थे जिन्हें एक पूरी साड़ी जैसे लंबे कपडे को एक सुदर्शन शैली के शाही साफे में तब्दील करना आता था। इस साफे के साथ मेरी जो फोटो प्रसारित हुई तो जीवन में पहली बार मुझे कॉंप्लिमेंट्स प्राप्त हुईं। जिन्हें अभी तक नहीं मिली हों, उन्हें राजस्थानी पगड़ी ट्राई करनी चाहिए। शायद सफलता मिले। महासचिव कमलेश कुमार गुप्ता को विशेष रूप से मैंने राजशथानी साफा ट्राई करने की सलाह दी है।

आश्रम के सभी कर्मचारियों-अधिकारियों को मैंने मृदुभाषी और सद्व्यवहारी पाया। आश्रम में 125 लोग ठहरे थे मगर व्यवस्थापकों में कहीं कोई तनाव या भागा-भागी नज़र नहीं आई। पर्याप्त कमरे हैं, और उचित संसाधन हैं। रमणीय वातावरण है। प्रशिक्षण या सभाओं के लिए एक हॉल भी है, मगर सभाएं सुबह तो एक लंबी-चौड़ी छत पर होती हैं, और धूप कड़ी होने पर नीचे लंबे-चौड़े बरामदे पर, जो हरे पेड़ों से घिरा हुआ है, इसलिए धूप-छांव का एक सुखद मिश्रण प्रस्तुत करता है। रात आने पर और ठंढ बढ़ने पर हॉल के भीतर सभाएं हो जाती हैं। हॉल में एक रंगमंच भी बना हुआ है, जो आश्रम की सांस्कृतिक रुझान की ओर संकेत करता है। वास्तव में पूरे कार्यक्रम की एक बहुत बड़ी विशेषता रही हर दिन दो नुक्कड़ नाटक। राजेन्द्र सिंह के साथ नजदीकी से जुड़े युवा साथी संजय के पास विलक्षण क्षमता है 10 मिनट में एक नुक्कड़ नाटक का स्क्रिप्ट लिखने की। जिस सामाजिक न्याय या पर्यावरण के मुद्दे पर राजेंद्र भाई ने कोई नाटक दिखाना चाहा, संजय ने न केवल तुरंत स्क्रिप्ट लिखा, बल्कि प्रतिभागी युवाओं और वृद्धों-वयस्कों को तुरत प्रशिक्षित कर नाटक का मंचन भी करा दिया।

राजेन्द्र भाई सुबह 6 से रात्रि 11 बजे तक लगातार कार्यक्रम संचालित करते देखे गए। देश के हर कोने से लोग आए थे, और प्रतिभागियों का स्तर अत्यंत उन्नत था। ज्यादा क्रियावादी पर्यावरण से सम्बद्ध थे, उसमे भी विशेष रूप से जल से जुड़े हुए। मगर अन्य मुद्दों से जुड़े विद्वान और प्रतिभागी भी थे। भाई चंद्रशेखर प्राण , जो पंचायती राज के विशेषज्ञ हैं, ने लगभग पांच घंटे 'तीसरी सरकार' पर भाषण दिया और प्रस्तुति की जो बहुत ही ज्ञानवर्धक थी। ऐसा उन्होंने मेरे सत्र को 'किल' करके किया, जिसका खामियाज़ा भी उन्हें दूसरे रूप में भुगतना पड़ा। महाराष्ट्र की प्रतिभा बहन ने भी कुछ घंटों के लिए शिवाजी की मराठा तलवार के साथ आकर (और चला कर) शिरकत की। पुणे से ज्ञान प्रबोधिनी की टीम भी उपस्थित थी, जिसने काफी प्रबोधित किया। इस पूरे गंभीर माहौल को बीच- बीच में सहज और सरस करने में इब्राहिम भाई की मीठी जुबान और हास्यपरक हस्तक्षेप ने सुन्दर भूमिका निभाई। पूरे कार्यक्रम का संचालित करने का दायित्व सबसे वरीय लोगों  में से एक रमेश भाई को दिया गया था। उन्हें कुछ लोगों ने मेरे कान में फुसफुसा कर हिटलर का अवतार बताया। मगर यह ज्यादती थी। उनमें यह क्षमता है कि वे दिए गए समय से अधिक भाषण देने वाले को बेबाक तरीके से रोकते हैं, भले ही भाषण देने वाला बुरा मान जाए; और रमेशजी भाई चंद्रशेखर प्राण के अलावा लगभग सभी मामलों में सफल रहे। प्राण साहब उनके दशकों-पुराने मित्र रहे हैं, इसलिए उनके मामले में वे दूसरी और देखते रहे; उन्हें रोकने की कोशिश नहीं की। स्पष्ट था कि रमेश भाई लोक सभा के स्पीकर पद के लिये अच्छे उम्मीदवार थे। (क्रमशः)

पी के सिद्धार्थ
14 दिसंबर, 2016