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Tuesday, 27 December 2016

सुविधाहीन बच्चों के प्रथम सम्पूर्ण निर्माण शिविर के अन्य संस्मरण (1)

सुविधाविहीन बच्चों के प्रथम सम्पूर्ण निर्माण शिविर (2006-07) के अन्य संस्मरण (1)

पी के सिद्धार्थ
अध्यक्ष, भारतीय सुराज दल

शिविर, जिसके दो बच्चों की चर्चा मैं कर चुका, की शुरुआत चिल्ड्रेन्स एन्थम या बाल गीत से की गयी। वह गीत कुछ इस प्रकार से था :

एफिल टावर कैसे बनते
लोहे से, इस्पात से?
नहीं-नहीं ये बनते हैं
कुछ करने के जज़्बात से।

ताजमहल कैसे बनते संग-
मरमर से पाषाण से?
नहीं-नहीं, नहीं-नहीं,
ये बनते हैं मेहनत से,
कल्पनाशक्ति-संधान से।

गोल्डन टेम्पल कैसे बनते,
सोने से, चट्टान से?
नहीं-नहीं ये बनते हैं,
भावना और बलिदान से।

सैटेलाइट कैसे बनते,
कलपुर्जों की शान से?
नहीं-नहीं ये बनते हैं,
इच्छाशक्ति और ज्ञान से।

इच्छाशक्ति, बुद्धि, कल्पना,
मेहनत और लगन ये,
धन से नहीं खरीदी जातीं,
उठती अंतर्मन से।

इन्हीं शक्तियों से देंगे हम
मोड़ समय की धारा,
जिससे बढ़ कर विश्वजयी हो,
हिंदुस्तान हमारा।

बच्चों को मैंने बताया कि प्रकृति-प्रदत्त बुद्धि या आई-क्यु चाहे जितनी भी हो, उसे बहुत अधिक बढ़ाया नहीं जा सकता। मगर भावना को बहुत बढ़ाया जा सकता है। बुद्धि और भावना को मिला कर ही जीवन में सफलता की मात्रा निर्धारित होती है। प्रकृति ने अगर आई-क्यु 100 में 10 दी है और भावना भी  100 में 10  तो कुल सफलता साधारणतः 20 ही होगी। प्रकृति-प्रदत्त आई-क्यू को 10 से बढ़ा कर 15 किया जा सकता है, मगर शायद उससे अधिक नहीं। मगर भावना को बढ़ा कर 10 दे 90 भी किया जा सकता है। तब सफलता होगी 15 (बुद्धि) plus 90 (भावना) अर्थात 105. इसलिए ऊँचा उठने की भावना विकसित करने पर ध्यान दें। खूब लगन की भावना से पढ़ें, और जादू देखें।

अगर एफिल टावर लोहे और इस्पात से बनते तो सबसे पहले कहाँ बनते, यह प्रश्न बच्चों से पूछा गया।
बच्चे चुप रहे।
मैंने कहा, भारत के झारखण्ड-ओडिसा मे, क्योंकि वैसा बढ़िया इस्पात तो यहीं पाया जाता है, फ़्रांस में नहीं। मगर यह तो एफिल नमक इंजिनियर के जज्बात थे, भावना थी कि वह दुनिया का सबसे ऊँचा टावर बना कर दिखा देगा, जिसने दुनिया का सबसे ऊँचा टावर फ़्रांस में सचमुच खड़ा कर दिया।

गोल्डन टेम्पल जब सिख्खों ने बनाना शुरू किया तो आक्रमणकारियों ने उसे 7 बार तोड़ा और हर बार सिखों का कतल किया। मगर सिक्खों ने बलिदान देकर भी हर बार एक नया बेहतर टेम्पल खड़ा किया। आज सोने से मढ़ा हुआ गोल्डन टेम्पल दुनिया के सुन्दरतम मंदिरों में एक है। यह सिख्खों की भावना और उनके बलिदान का प्रतीक है। बहुत बड़ी उपलब्धियां विरले ही बिना उत्कट भावना और बलिदान के प्राप्त होती हैं।

बच्चों को यह भी बताया गया कि भावनाएं बाजार में नहीं मिलतीं बल्कि हमारे अंतर्मन में रहती हैं। इसलिए उन सभी को सुलभ हैं।

बच्चों ने बड़े ध्यान से इन बातों को सुना और गुना! मुझे नहीं पता था कि आने वाले हफ़्तों में इन बच्चों की भावना भी प्रज्वलित हो कर एक नया रंग दिखलाने वाली थी। (क्रमशः)

पी के सिद्धार्थ
8252667070
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27 दिसंबर, 2016

Sunday, 25 December 2016

मेरा प्रिय छात्र अमरजीत

मेरा प्रिय छात्र अमरजीत

पी के सिद्धार्थ
अध्यक्ष, भारतीय सुराज दल

सुविधाविहीन बच्चों के इस सम्पूर्ण निर्माण शिविर ने मुझे  यह अनुभव दिया कि एक चौथाई बच्चे बेहद मेधावी थे और एक चौथाई बेहद मंदबुद्धि। बाकी औसत बुद्धि के थे। बेहद मेधावी बच्चों में एक था अमरजीत कुमार। इस बच्चे पर शिविर शुरू होने पर मेरी पहली विशेष नज़र तब पड़ी जब मैंने दूसरे ही दिन सुबह शिविर में जाने पर यह पाया कि अमरजीत नाम का एक बच्चा अनुपस्थित था। फिर जब बच्चों के पास दिन के भोजन में शरीक होने आया तो मैंने उसे बुला कर जवाब तलब किया कि वह कहाँ गायब हो गया था। उसने तब मुझे बताया कि वह सुबह 4 बजे से 7 बजे तक अख़बार बांटता था, और अपने परिवार के लिए रोजी-रोटी जुटाता था। उसके पिता भी यही काम करते थे, यानि पेपर भेंडर थे। बड़ा परिवार था, और माता-पिता के अलावा एक छोटा भाई और चार बहनें थीं। इसलिए अगर महीना भर उसने अख़बार बांटना छोड़ दिया तो घर का खर्च चलाना मुश्किल हो जा सकता था। इसलिए उसने मुझसे रोज सुबह तीन से साढ़े तीन घंटे अनुपस्थित रहने की छूट मांगी।

मेरे पास उसकी पूरी जुबानी सुनने के बाद इसके सिवा कोई चारा नहीं बचा कि मैं उसे अनुमति दूँ। मगर यह मेरी कल्पना के बाहर था कि इतना छोटा बच्चा पेपर भेन्डिंग का काम कर घर का खर्च चलाने में अपने पिता की मदद करे। लेकिन सच्चाई यही थी। मुझे बाल श्रम क़ानून के सन्दर्भ में हुई न्यायमूर्ति सावंत से वार्ता याद आ गयी कि हम पश्चिमी देशों के विचारों और कानूनों की अंधाधुंध नक़ल बिना अपने देश की जमीनी सच्चाई का आकलन किये करते जा रहे हैं। न्यायमूर्ति सावंत के विचार में भारतीय बाल श्रमिक कानून भी अव्यवहारिक था, क्योंकि बहुतेरे गरीब परिवारों में 14 साल से कम के बच्चे बाल-श्रमिक बन दो शाम की रोटी जुटाने में मदद करते हैं। अमरजीत इसका एक उदहारण था। लेकिन अभी मेरे दिमाग में कानून कम और शिक्षा अधिक सक्रिय थी।

अमरजीत की विशेषता यह थी कि वह 3-4 घंटे अनुपस्थित रह कर भी सबसे आगे चल रहे बच्चों की पंक्ति में था, और अगर उसे पूरा समय बाकी बच्चों की तरह मिला होता तो वह तौसीफ से पीछे नहीं रहता।

इस बच्चे की दूसरी विशेषता यह थी कि उसे अपने जीवन से कोई शिकायत नहीं थी, और वह हमेशा प्रसन्नचित्त रहता था। अपनी साइकिल वह शिविर में ही रखता था, और वहीँ से जाकर अख़बार उठा कर घर-घर बाँट कर ख़ुशी-ख़ुशी शिविर में आकर पढ़ने में लग जाता था। यह उसके जीवन की परिस्थितियों के बीच एक विरल चीज़ थी।

मैंने बाद में दिल्ली में 5 राज्यों के बच्चों का जब 10 दिनों का एक सम्पूर्ण निर्माण शिविर लगाया तो अमरजीत को उसमे भी आमंत्रित किया। वहां उसे अख़बार बेचने के लिए समय बिताने की जरुरत नहीं थी, इसलिए कई राज्यों के लगभग 120  बच्चों के बीच वह प्रथम आया।

मैं यह दावे के साथ कह सकता हूँ कि शिविर के 4-5 बच्चे इतने मेधावी थे कि अगर वे किसी सुविधासंपन्न घर में पैदा हुए होते तो आई आई टी-जैसी परीक्षाएं आसानी से निकाल लेते। अथवा अगर देश की शिक्षा-व्यवस्था इस प्रकार की होती कि सारे ऐसे मेधावी बच्चों को अलग कर उनके लिए बेहतर शिक्षा की व्यवस्था कर पाती तो भी यह संभव हो पाता।

पी के सिद्धार्थ
8252667070
pradeep.k.siddharth@gmail.com
www.pksiddharth.in

Friday, 23 December 2016

मेरा प्रिय छात्र तौसीफ भाग 2

मेरा प्रिय छात्र तौसीफ (भाग 2)

पी के सिद्धार्थ
अध्यक्ष, भारतीय सुराज दल

इस प्रकार उच्चाधिकारी की सिफारिश पर तौसीफ मेरे शिक्षा-शिविर में प्रवेश कर गया।

शिक्षा-शिविर एक महीना लंबा था और ऐकडेमिक्स के नजरिये से घटनापूर्ण था। इसका विवरण एक छोटे-से उपन्यास का रूप ले सकता है। इसलिए विवरणों में न जाते हुए मैं तौसीफ पर ध्यान केंद्रित करना चाहूँगा।

मैंने कैम्प के दस्तावेजीकरण के लिए शिविर के पहले दिन तीन अलग-अलग स्वतंत्र मूल्यांकन टीमें बुलाई थीं। उनमें एक थी स्थानीय मीडिया की टीम। इसमें 22 या 24 अख़बारों और टी वी चैनलों के लोग थे। स्थान था एच ई सी का गेस्ट हाउस। मैंने मीडिया वालों को कहा कि आप लोग बच्चों से बात-चीत कर इनके विचारात्मक स्तर या कॉन्सेप्ट-फॉर्मेशन, आत्म-विश्वास, सम्प्रेषण-क्षमता, हिंदी-अंग्रेजी लिखने-बोलने की कुशलता आदि का अपनी और से मूल्यांकन करें। फिर शिविर शेष होने पर एक बार फिर से इनसे मुलाकात करें, और एक बार फिर देखें कि एक महीने में क्या फर्क पड़ा।

मीडियाकर्मियों ने बच्चों से बात-चीत कर अपनी ओर से इनका आकलन किया। फिर वे चले गए।

शिविर शुरू हुआ। जो बच्चे शिविर में आये थे, उनमें से अधिकांश पढ़ने-लिखने वाले बच्चे नहीं थे, ऐसा उनके शिक्षकों ने बताया। ये घूमने-फिरने वाले, मौज़ मस्ती करने वाले बच्चे थे। अनेकों एन सी सी के कैम्प कर चुके बच्चे थे, जो शायद फिर से एक कैम्प की मस्ती लूटने आए थे।

मगर जल्द ही बच्चों ने पढ़ाई में गति पकड़नी शुरू की। उनमे सबसे शांत तौसीफ था जो कभी बिना पूछे एक शब्द नहीं बोलता था।

मैं अपने कार्यालय से लौटने के बाद, अक्सर रात के भोजन के उपरांत, बच्चों को रात एक-दो बजे तक पढ़ाता था, और बच्चों की रात में ही नियमित परीक्षा भी लिया करता था। सुबह ऑफिस जाने के पूर्व भी देखता था, और दिन का भोजन भी बच्चों के साथ करता था। अलग-अलग चीजों के लिए नित्य प्रथम-द्वितीय-तृतीय आने के प्रमाणपत्र भी दिया करता था। इन प्रमाण-पत्र नामक कागज के टुकड़ों के लिए बच्चों में जबरदस्त होड़ लगा करती थी, और वे कभी-कभी रात भर जग कर पढ़ा करते थे। बाद में इनका सोना सुनिश्चित करने के लिए मुझे गार्ड बुलाने करने पड़े। बच्चे काफी उत्साह और उत्तेजना में रहा करते थे। मगर तौसीफ न तो कभी उत्तेजित दिखा, न उत्साहित या हतोत्साहित, बल्कि शांत भाव से अपना दिया हुआ काम करता रहा।

जल्द ही मैंने पाया कि अंग्रेजी की परीक्षाओं में तौसीफ सातवीं-आठवीं- नवीं के बच्चों के मेधावी बच्चों को भी पीछे छोड़ने लगा। उस 22 बच्चों के समूह में 4 या 5 बच्चे अत्यंत मेधावी थे। मगर वे छठी कक्षा के इस मूक बालक से पार नहीं पा रहे थे। अंत में शिविर समाप्त हुआ और एक सार्वजनिक समारोह कर उन्हीं मिडिया-कर्मियों को फिर उन बच्चों के आकलन के लिए बुलाया गया।

एक संक्षिप्त परिचयात्मक भाषण के बाद बच्चों की सार्वजानिक तौर पर मीडिया के समक्ष परीक्षा ली जाने लगी।

परीक्षा लेने के लिए अंग्रेजी अख़बारों के पत्रकारों को ही मैंने आमंत्रित किया। उन्हें उन डेढ़ हज़ार शब्दों की सूची भी थमा दी गयी जिन्हें कैंप के दौरान बच्चों ने याद किया था। फोनेटिक्स से सम्बद्ध प्रश्नों को भी उन्हें दे दिया गया। उन्होंने प्रश्न पूछने शुरू किये।

जैसे ही दो-तीन बच्चों की अंग्रेजी की सार्वजनिक परीक्षा खत्म हुई, तौसीफ न नंबर आ गया। पिछले बच्चों ने गलतियां तो न के बराबर ही की थीं, मगर बीच-बीच में कभी-कभी सोच कर बोलते थे, क्यों कि यहाँ काफी भीड़ थी और ढेर सारे कैमरे लगे हुए थे। इस तरह के माहौल में तो अच्छे-खासे लोग भी नर्वस हो जाते। मगर जब तौसीफ की परीक्षा शुरू हुई तो तौसीफ को किसी भी सवाल के जवाब में एक क्षण भी सोचना नहीं पड़ा। वह बलकुल बिना नर्वस हुए सारे सरल या कठिन सवालों का जवाब बिना जरा भी ठहरे देता चला गया। सारे अंग्रेजी शब्दों की स्पेलिंग, उच्चारण, अर्थ उसने सही बताये, और सभी फ़ोनेटिक सिंबल्स की ध्वनियाँ सही निकालीं।

मीडिया एकदम से सकते में आ गयी और उसने 10 मिनट के भीतर अपना धीरज खो दिया। अरफा-तरफी का माहौल हो गया। अख़बार वाले और टी वी चैनेल वाले खींच-खींच कर बच्चों को प्रांगण में इधर-उधर ले जाने लगे और उनका साक्षात्कार और 'बाइट्स' लेने लगे। मैं और बाकी शिक्षक-शिक्षिकाएं जिनमे विनीता, श्रीमती सुजाता गुप्ता और खुद मैं भी शामिल था, भुला दिए  गए। जब उन्हें याद आया कि इस पूरे उपक्रम में हम लोगों की भी भूमिका थी, तो पत्रकारों ने थोडा रुक कर मुझसे भी बात-चीत करने का कोरम पूरा किया।

उन्होंने यह पूछा कि यह 'मिरेकल' कैसे हुआ। अन्य ने पूछा कि क्या ऐसा 'असंभव' कार्य स्कूलों में हमारी पद्धति से नहीं हो सकता?

मैंने कहा कि यह कोई मिरेकल नहीं है : कुछ तो युगों से स्थापित सामान्य शिक्षण-सिद्धांत हैं तथा  कुछ हमारे द्वारा विकसित नयी तकनिकियां ऐसे परिणाम सभी स्कूलों में उत्पन्न कर सकती हैं। लेकिन हम कोई सरकार तो नहीं जो व्यापक स्तर पर सभी सरकरी स्कूलों में ये प्रयोग लागू कर सकें। इसपर एक राष्ट्रीय अंग्रेजी अख़बार की पत्रकार ने जो गैरवाजिब  सवाल पूछा वह अभी तक मेरे जेहन में है : "क्या आप पत्रकारों के बच्चों के लिए एक शिविर आयोजित नहीं कर सकते?" मुझे मुस्कराते हुए  इस सवाल का जवाब टालना पड़ा।

जब मैं पत्रकारों से निवृत्त हो कर विनीता की ओर मुड़ा तो मैंने देखा कि उनकी आँखों से आंसू आ गए थे। मुझे पिछले महीने सुबह चार बजे की कपकपाती ठंढ में मेरी पाठशाला में प्रवेश के लिए व्याकुल तौसीफ की आँखों से ढलकते आंसू याद आ गए। गलती तो मेरी ही थी। जब मुझे लर्निंग-आउटकम पर भावना की उत्कटता के प्रभाव की जाँच करनी थी तो तौसीफ को छांटने की कोशिश नहीं करनी चाहिए थी, क्योंकि उसके आंसुओं से बढ़ कर उसकी भावना की उत्कटता का प्रमाण और क्या हो सकता था? अपनी नैसर्गिक प्रतिभा के अलावा उसकी तीव्र भावना ने उसे अपने से काफी ऊँची कक्षाओं के बच्चों को पीछे छोड़ने में मदद की थी। सभी बच्चों ने मिल कर सिद्ध कर दिया था कि भावना उत्कट हो और थोडा मार्गदर्शन और उत्साहवर्धन मिल जाये तो न केवल पढाई में बल्कि जीवन के किसी भी क्षेत्र में जीत प्राप्त करने से कोई रोक नहीं सकता।

शाम को दिल्ली और मुम्बई से फोन आ गए कि उनलोगों ने टी वी पर शिविर के बच्चों के अद्भुत प्रदर्शन का समाचार देखा। यानी देश भर में टी वी चैनलों ने इस शिविर का समाचार फ्लैश किया। अगले दिन सभी हिंदी-अंग्रेजी अख़बारों ने इस कैम्प के समाचार छापे, और कुछ प्रमुख अख़बारों ने तो हर एक बच्चे की तस्वीर तक छापी। इस प्रयोग ने देश के करोड़ों सुविधाविहीन और निर्धन बच्चों की अन्तर्निहित महान क्षमता पर मेरी आस्था दृढ कर दी।

पी के सिद्धार्थ
8252667070
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Sunday, 4 December 2016

मदन कृष्ण वर्मा : सामाजिक क्षेत्र जे एक स्मरणीय व्यक्तित्व (भाग 1)

मदनकृष्ण वर्मा : सामजिक क्षेत्र के एक स्मरणीय व्यक्तित्व (भाग 1)

पी के सिद्धार्थ
अध्यक्ष, भारतीय सुराज दल

मैं भारतीय पुलिस सेवा के त्रिपुरा काडर का अधिकारी रहा। लेकिन 1989 में तीन वर्षों के लिए तत्कालीन अविभाजित बिहार में प्रतिनियुक्त हुआ। 1990 के अंत की ओर मेरी पदस्थापना बिहार के सबसे 'बुरे' जिले पलामू में हुई, जो गंभीर रूप से नक्सल-प्रभावित था। दुमका जिले के एस पी के रूप में सत्ताधारी दल के एक विधायक के 'पीछे पड़ने' और उन्हें जिला छोड़ देने को बाध्य करने के फलस्वरूप मुझे 'सबक सिखाने' के लिए मुझे पलामू का प्रभार दिया गया, ऐसा एक राजनेता ने मुझे बताया। लेकिन पलामू न केवल मेरे पुलिस करियर का सबसे चुनौतीपूर्ण प्रभार सिद्ध हुआ, बल्कि इस जिले ने जीवन के उस आयाम से मेरा परिचय कराया जिससे तब तक मेरा वास्तविक परिचय नहीं हुआ था। गरीबी, सामंतवाद, भ्रष्टाचार और अन्याय, तथा इन सबके मिश्रण से उत्पन्न नक्सलवाद - इन सबने मिल कर भारत की जमीनी सच्चाई के प्रति अभूतपूर्व रूप से मुझे सजग किया।

नक्सलवाद से मेरा सामना पहले कभी नहीं हुआ था। एक ओर पुलिस अधिकारी के रूप में मेरा कर्त्तव्य था कानून और व्यवस्था बनाये रखने के लिए नक्सलवादियों की गिरफ़्तारी और उनसे मुठभेड़, वहीँ दूसरी ओर यह समस्या थी कि उस वक्त सिवाय नक्सलवादियों के गरीब को किसी दूसरे से त्वरित न्याय की कोई आशा नहीं थी।

थाना और बीडीओ गरीब को घुसने नहीं देते थे, और न्यायलय की लंबी और खर्चीली न्याय-व्यवस्था उनके बूते के बाहर की चीज़ थी। यह जानने-योग्य बात है कि यहाँ गरीब की जमीन पर कोई भी थोडा समृद्ध या मजबूत व्यक्ति थोड़ी-सी रिश्वत रेवेन्यू कर्मचारियों को दे कर एक फर्जी कागज बनवा कर एक 'भू-विवाद' उत्पन्न कर देता था (और अभी भी करता है), और उसके बाद डेपुटी कलक्टर (लैंड रेवेन्यू) और ए डी एम (लैंड रेवेन्यू), और फिर सिविल कोर्ट में मुक़दमे की पैरवी के लिए  दौड़ने की प्रक्रिया गरीब की कमर तोड़ देती है। इसलिए गरीब हार कर बैठ जाता था। सदियों तक अंग्रेजों से लेकर हिंदुस्तानी सरकारों तक यही चलता रहा है। अंत में नकसलाइट उठे और उन्होंने बंदूक के बल पर गरीब से कब्जे में ली गयी जमीन से सामंती तत्त्वों और दबंगों को भगाना शुरू किया। गोलियां चलने लगीं। सामंतों ने भी अपनी 'सनलाइट सेना' बना कर नक्सलियों का प्रतिकार करना शुरू किया। इसी संघर्ष के दौर में मैं पलामू में उतरा।

इस संघर्ष में तीन-तीन हज़ार लोग सैकड़ों बंदूकों के साथ रात में भूस्वामियों के यहाँ धावा बोल देते थे। मैं जल्द ही पूरी समस्या से अवगत हो गया। नक्सलवादियों के विरुद्ध धर-पकड़ का अभियान शुरू हो गया जिसे 'अभियान अग्निदूत' का नाम दिया गया। एक-के-बाद-एक शीर्ष नक्सली नेता पकड़े जाने लगे। टाइम्स ऑफ इण्डिया के एक स्थानीय पत्रकार लंबे समय से पलामू में रहते आ रहे थे, और पढ़े लिखे प्रोफ़ेसर भी थे। वे पलामू के ग़रीबों की हालत से परिचित थे और 'प्रो-पुअर' थे। वे भीतर-ही-भीतर इस धर-पकड़ से घबराये हुए थे। एक दिन उनसे नहीं रहा गया। उन्होंने मुझसे पूछा, "सिद्धार्थ साहब, आप यह क्या कर रहे हैं! सभी को पकड़ लेंगे तो गरीब को मदद कहाँ से मिलेगी?" यही चिंता मेरी भी थी, मगर मैं अपने क़ानूनी कर्त्तव्य से मजबूर था। फिर संविधान की शपथ ली थी। यों भी मैं लोकतन्त्र में हिंसा का रास्ता अपनाने के विरुद्ध रहा हूँ। तो क्या किया जाय, यह मेरी चिंता थी, जो हर नक्सल नेता की गिरफ़्तारी के साथ बढ़ती जा रही थी।

मैंने अपने मित्र श्रीकृष्ण से मानसिक संवाद शुरू किया, उनकी गीता उलटी-पलटी। फिर बेतला अभयारण्य गया, और वहां गेस्ट हाउस में बैठ कर अरण्य देखता हुआ उपाय सोचता रहा। नदी के किनारे बैठ कर लहरों से पूछता रहा। अपने दो मित्र हथिनियों जूही और अनारकली (अनारकली का पिछले महीने निधन हो गया - ईश्वर उन्हें सद्गति दे!) से मिल कर उनसे भी मूक संवाद किया। धीरे-धीरे एक विचार आकार लेने लगा। (क्रमशः)

पी के सिद्धार्थ
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Thursday, 13 October 2016

गोविंदाचार्य से मेरी तीसरी मुलाकात : भाग 1

गोविंदाचार्य से मेरी तीसरी मुलाकात

पी के सिद्धार्थ
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गोविन्द जी से मिलने मैं ग्रीन पार्क मेट्रो  स्ट्रेशन के पास गुलमोहर एन्क्लेव पहुँचता हूँ जहाँ कल फोन पर मुलाकात करनी तय हुई थी। टैक्सी उस घर के सामने रुकती है जिसका नंबर उन्होंने कल दिया था। 10 से 10.30 के बीच मैं पहुंचूंगा, ऐसा मैंने बताया था। 10.20 में मैं टैक्सी से उतर कर सामने के दरवाजे की ओर बढ़ता हूँ। दरवाजे में ताला लटक रहा है। किसी से पूछता हूँ तो बताया जाता है कि बगल के दरवाज़े से जाया जा सकता है। ऊपर जाने की सीढ़ियों वाले गलियारे में वह बगल वाला दरवाज़ा दिखता है जिसके ऊपर वही मकान नंबर लिखा है। मैं दरवाजे के सामने खड़ा होता हूँ। मगर इसमें भी ताला बंद है, और बड़े अक्षरों में लिखा है, 'डेंजर, 440 वोल्ट'। हड्डियों की तस्वीरें भी बनी हैं। "गोविन्द जी तो एक सौम्य और मधुर इंसान हैं, फिर यहाँ 440 वोल्ट की नोटिस क्यों लगी है?", मैं हैरान हूँ!

मैं उन्हें SMS करता हूँ कि मैं पहुँच चूका हूँ। फिर बगल के पार्क में जा कर बैठ जाता हूँ, और प्रतीक्षा करता हूँ। 10.45 में लौट कर फिर देखता हूँ तो ताले पूर्ववत लगे हुए हैं। मैं तब उन्हें फोन करता हूँ। वे पीछे के दरवाजे से निकल कर आते हैं और बैठक में ले जाते हैं। वास्तव में वे 10 बजे ही पहुँच कर मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे। SMS उन्होंने देखा नहीं।

यह घर वास्तव में उनके एक वकील सहयोगी का है जिन्होंने मुख्य द्वार दूसरी और रखा है। गोविन्द जी अकेले ही हैं, इसलिए अच्छी चर्चा की संभावना दिखती है।

गोविन्द जी को मेरे साथ 1974 की पहली और अभी छह महीने पहले की दूसरी मुलाकात का स्मरण हैं।

"गोविन्द जी, जहाँ तक मैं जानता हूँ आपने अपने-आप को भाजपा से अलग कर लिया है।", मैं शुरुआत करता हूँ।

"सही सुना आपने।"

"और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से भी दूरी बना कर स्वतंत्र रूप से काम कर रहे हैं।"

"मैं उनके स्ट्रक्चर में नहीं हूँ। भावना मिलती है। जिन संगठनों के साथ काम करता हूँ, उनमें एक संघर्षात्मक है, दूसरा रचनात्मक। संघर्षात्मक संगठन का नाम है, 'राष्ट्रीय स्वाभिमान मंच' जिसे बासव राज पाटिल जी देखते हैं। रचनात्मक संगठन का नाम है 'भारत विकास संगम'। इसे जो देखते हैं उनका भी नाम बासव राज पाटिल ही है। वे राज्य सभा के सदस्य हैं", गोविन्द जी बताते हैं।

"इस वक्त हममें से प्रत्येक अलग-अलग मुद्दों पर अलग-अलग काम कर रहे हैं। इसलिए पूरी तरह प्रभावी नहीं हो रहे। देश में बड़े परिवर्तन नहीं हो पा रहे। हमें थोडा पुनर्विचार करने की जरुरत है। इसके लिए हमें किसी एकांत स्थान में दो दिन पूरी टीम के साथ बैठ कर थोडा मंथन करने की जरुरत है। अभी हाल में मैं और स्वामी अग्निवेश की टीम के 10-12 लोग गुडगाँव के भेलपा आश्रम में दो दिन रहे। साथ रह कर विमर्श और चिंतन किया। बहुत उपयोगी रहा यह मंथन!",  मैं उन्हें सूचित करता हूँ।

गोविंद जी थोड़े शंकित दीखते हैं।

"स्वामी अग्निवेश? मगर अन्ना आंदोलन में उनकी भूमिका तो संदिग्ध रही! हमें ऐसे लोगों को साथ ले कर चलना चाहिए जिन पर भरोसा किया जा सके", गोविन्द जी कहते हैं।

"गोविन्द जी, इस समय देश में ऐसा कौन है जिसमे कोई दोष नहीं निकाला जा सके? मैंने भी स्वामी अग्निवेश की एक रेकॉर्डिंग् उस समय सुनी थी। जुबान के ऐसे स्खलन कई लोगों से हो जाया करते हैं, या हो सकते हैं। उन्होंने उस समय जो कहा, उसका अगर पुनर्मूल्यांकन बाद के इतिहास के आलोक में किया जाय तो थोड़ा  भिन्न अनुभव भी हो सकता है। फिर मेरे विचार से किसी का मूल्यांकन होलिस्टिकलि होना चाहिए, यानि उसके सम्पूर्ण कृतित्व को ले कर होना चाहिए। किसी एक बात को ले कर किसी की सारे जीवन की साधना को नकारना उचित नहीं। अब मोदी जी के सारे जीवन का मूल्यांकन क्या एक 27 साल की लड़की की जासूसी करवाने के प्रसंग को केंद्र बना कर करना वाजिब हैं? या नेहरू का आकलन सिर्फ उनके चरित्र के एक पहलु, जिसे उनके पी एस मथई ने उजागर किया, की रौशनी में करना उचित है? आजकल कुछ बुद्धिजीवी गांधी द्वारा अपने काम-भाव के परिक्षण को लेकर एक सार्वजनिक तौर पर किये गए प्रयोग को केंद्र बना कर उनकी सारी उपलब्धियों को एक सिरे से ख़ारिज करने पर तुले रहते हैं।

आज देश की टोकरी में जितने आम हैं सभी पर कोई-न-कोई दाग लोगों को दिखता है। सवाल है की सभी आमों को उठा कर फ़ेक दिया जाय या उनका प्रयोग देश के पोषण के लिए किया जाय।"

"नहीं, नहीं, उनका प्रयोग होना ही चाहिए।", गोविन्द जी स्वीकार करते हैं।

"अभी तेज बारिश हो रही है। देश को बचाना है इस अन्याय, भ्रष्टाचार और गरीबी की खूनी बारिश से। अभी तो हमें छाता लाल हो ता हरा या भगवा, यह भी देखने का समय नहीं है। सभी छाते इस देश को मिल कर इस दुर्द्धर्ष  बारिश से बचाने में लग जाने चाहिए", मैं विनम्रतापूर्वक कहता हूँ और गोविन्द जी सर हिला कर अनुमोदन करते हैं।

इस वक्त एक ऐसी लोकहित याचिका उच्चतम न्यायलय में हम दाखिल करने जा रहे हैं, जो सीधे भ्रष्टाचार पर नहीं मगर उस उदर पर प्रहार करेगी जहाँ से भ्रष्टाचार की पैदाइश होती है। आपको मैंने पिछली बार इस योजना से अवगत कराया था। मेरे साथ मल्लिका साराभाई और श्याम बेनेगल इसमें पिटीशनर बनने को तैयार हो गए हैं। आप भी पिटीशनर बनें तो अच्छा हो। एक कम्युनिस्ट पार्टी के प्रमुख को भी मैं मना रहा हूँ ताकि लेफ्ट और राइट दोनों इस युद्ध में शरीक हों, और देश को एक होकर  युद्ध करने का सन्देश जाये। (क्रमशः)

पी के सिद्धार्थ
अध्यक्ष, भारतीय सुराज दल
13 अक्टूबर, 2016