जे पी और मैं
(भाग 3)
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जब मैं बड़ा हुआ तो धीरे-धीरे अपनी दादी से जे पी और प्रभावती की कहानियां सुनने-समझने लगा। इसमें से अधिकांश तो जे पी के जीवन पर लिखी जाने वाली किताबों में उपलब्ध होंगी इसलिए यहाँ दोहराने का कोई प्रयोजन नहीं। मैंने गांधी, आंबेडकर, लेनिन, यहाँ तक कि चे गुएवरा की भी जीवनी पढ़ी है, मगर जे पी की कोई जीवनी पढ़ी नहीं, शायद इसलिए कि मुझे लगा कि इनको तो मैं पहले से ही जनता हूँ। मगर कुछ ऐसी बातें, जो शायद परिवार के लोग ज्यादा जानते होंगे, लिख सकता हूँ।
इन कुछ अंतरंग बातों में एक यह थी कि पैदा होने के बाद कई सालों तक जे पी बोल नहीं पाते थे। यह पूरे परिवार में चिंता का विषय बन गया था। यह मान लिया गया कि एक अत्यंत मंद बुद्धि बालक घर में पैदा हो गया था। इसलिए उनका नाम 'बउल' रख दिया गया। मैं नहीं जानता कि ऐसा कोई शब्द शब्दकोश में है, और अगर है भी तो उसका अर्थ क्या होता है, मगर मेरी दादी, जिन्हें हम 'ईया' कहते थे, के अनुसार 'बउल' का अर्थ था 'मंदबुद्धि'। लेकिन मैं आपको बताना चाहूँगा कि जब मैंने जे पी को एक सार्वजानिक मंच से, पटना के गांधी मैदान में, हिंदी में, और बीच-बीच में अंग्रेजी में बोलते सुना, तो मेरे मन में बड़ी हैरानी पैदा हुई कि क्या कोई एक व्यक्ति बोलने वाली अंग्रेजी और बोलने वाली हिंदी में सामान रूप से इंतना निष्णात हो सकता है! और वह भी एक राजनेता! कहीं-न-कहीं वह एक अनुभव मेरे अवचेतन मन में जाकर स्थिर हो गया, और इन दोनों भाषाओँ पर थोड़ा ही मगर समान अधिकार प्राप्त करने को मुझे लगातार प्रेरित करता रहा। मगर कहाँ जे पी और कहाँ मैं! न तो उनके जैसी हिंदी, न उन-जैसी अंग्रेजी बोलने में उनका दस प्रतिशत भी हासिल कर सका। लेकिन यह बात हमेशा मुझे हैरान करती रही है कि इतना अच्छा बोलने वाला व्यक्ति आखिर बचपन में इतने वर्षों तक 'बउल' क्यों बना रहा!
जे पी की भाषण-शैली बहुत विचारशीलता से युक्त थी, सौम्य थी, बहुत तेज गति उसमें नहीं थी, और जरा भी आक्रामकता उसमें नहीं थी। मैंने गांधी को सुना है, अंग्रेजी और हिंदी दोनों में बोलते हुए। उनकी भाषण-शैली को अगर उनके चरित्र और व्यक्तित्व से हटा कर देखा जाय तो वह बहुत ही मामूली लगेगी। नेहरू को भी हिंदी और अग्रेज़ी दोनों भाषाओँ में मैंने बोलते देखा-सुना है, टीवी पर। वे मुझे अधिक प्रभावित नहीं कर पाये। इस विषय में निश्चय ही मतभेद हो सकते हैं, मगर मेरा मत तो यही है।
लेकिन मैं यह बताना चाहूँगा कि अगर जे पी को मैने गांधी मैदान के सार्वजानिक मंच से नहीं सुना होता, तो मैं नहीं जान पाता कि 'बउल' बाबा को (हमारे परिवार में पितामह, यानि पिता जी के पिता को 'बाबा' कहने का रिवाज था।) भोजपुरी के अलावा कोई और भाषा भी बोलनी आती थी, क्योंकि जब भी उनके यहाँ गया तो अपने बाबा के साथ गया, और उसके बाद दोनों भाई सिर्फ भोजपुरी में ही बातें करते नज़र आये! कभी उन्हें हिंदी या अंग्रेजी में वार्तालाप करते नहीं सुना।
पी के सिद्धार्थ
15 सितम्बर, 2016
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