Showing posts with label BSD. Show all posts
Showing posts with label BSD. Show all posts

Tuesday, 11 October 2016

गोविंदाचार्य से मेरी पहली मुलाकात के संस्मरण

श्री गोविंदाचार्य से मेरी पहली मुलाकात के संस्मरण।

पी के सिद्धार्थ
7070962999
www.suraajdal.org
www.bharatiyachetna.org
www.pksiddharth.in

आज श्री गोविंदाचार्य से दिल्ली में मुलाकात हुई। बहुत ही सार्थक मुलाकात! मगर इसके पहले कि मैं आज की मुलाकात के विवरण लिखूं, मुझे इनसे 1974 में हुई पहली मुलाकात की स्मृतियाँ उकेरने की इच्छा होती है।

1974 में मैं पटना कॉलेज में बी ए का विद्यार्थी था। उस समय बिहार में हिंदी के प्रमुख अख़बार आर्यावर्त के संपादक श्री जयकांत मिश्र के पुत्र श्री पद्माकर मिश्र से मेरी मित्रता संगीत को लेकर हो गई थी, क्योंकि वे एक अच्छे सितारवादक थे, और मैं एक संगीत-पसंद व्यक्ति था। एक दिन पद्माकर जी ने मुझे बताया कि वे मुझे गोविंदाचार्य जी से मिलाना चाहते थे, जो बिहार विद्यार्थी परिषद् के प्रभारी थे। पद्माकर जी ने मुझे अपने घर डिनर पर आमंत्रित किया और साथ ही गोविंदाचार्य जी को भी। अतः श्री जयकांत मिश्र के घर पर हम तीनों की मुलाकात एक शाम हुई। मेरे एक अभिन्न मित्र चन्दन सिंह भी इस मौके पर आमंत्रित और उपस्थित थे। चन्दन जी एक बहुत ही प्रतिभावान कवि और संगीतविद थे।

यह उस समय के अख़बार के संपादक का घर था। कोई समृद्धि कहीं नजर नहीं आ रही थी। बैठक के नाम पर कोई 9 या दस फ़ीट लंबा और 8 फ़ीट चौड़ा एक कमरा था जिसमें एक चौकी बिछी थी और दो-तीन लकड़ी की बिना गद्दे वाली कुर्सियां लगी थीं।

गोविन्द जी की भाषाशैली और हाव-भाव, जिसे आजकल अंग्रेजी में बॉडी लैंग्वेज कहते हैं, ने यह तुरन्त बता दिया कि मैं जिस व्यक्ति से मुखातिब था वह एक अत्यंत पवित्र आत्मा था, जो स्वार्थ से ऊपर उठा हुआ था, और जो सिर्फ और सिर्फ राष्ट्रभक्ति की भावना से प्रेरित था। यह भी साफ़ था कि वह न केवल भावनामय था, बल्कि सामान रूप से विचारशील भी था। वह जो पहला विचार मेरा इस व्यक्ति के सम्बन्ध में मिनटों में बना, आने वाले दशकों के एक लंबे समय ने उसे प्रमाणित भी किया।

गोविन्द जी ने मुझे यह प्रस्ताव दिया कि मैं विद्यार्थी परिषद में शरीक होने पर विचार करूँ। उस समय मुझे राजनीति में कोई रूचि नहीं थी। लेकिन मेरा दिमाग कभी भी किसी नई बात के लिए पूरी तरह बंद नहीं रहता था, और अगर उचित कारण मिलते तो किसी नए उद्यम के लिए मैं तत्पर हो सकता था।

डिनर शुरू होने के पहले गोविन्द जी ने मुझे एक लंबा भाषण दिया जिसका सारांश यह था कि देश की बहुतेरी समस्यायों की जड़ में लॉर्ड मैकॉले की शिक्षा पद्धति थी। कांग्रेस की गलती गोविन्द जी के अनुसार यह थी कि उसने मैकॉले की शिक्षा-व्यवस्था को ही आगे बढ़ाया, उसे परिवर्तित नहीं किया।

मैंने गोविन्द जी की बातें ध्यान से सुनीं। उनकी बातों से मन में सहमति बन रही थी। उनकी बातें ख़त्म होने पर मैंने उनसे वही सवाल किये जो किसी भी व्यक्ति को करना चाहिए होता।

"गोविन्द जी, आपकी बातें तो ठीक लग रही हैं। मगर अब मूल सवाल यह है कि सत्ता में आने पर मैकॉले की शिक्षा व्यवस्था की जगह आपकी पार्टी किस वैकल्पिक व्यवस्था को लागू करेगी। उस वैकल्पिक शिक्षा- व्यवस्था का ब्लूप्रिंट कहाँ है?", मैंने पूछा।

गोविन्द जी मौन हो गए, और कुछ देर मौन रहे।

"मैं नहीं कहता कि आपकी पार्टी ने नयी शिक्षा-व्यवस्था का जो ब्लूप्रिंट तैयार किया है वह आप मुझे दिखा दें, क्योंकि वह पार्टी का एक ट्रेड सीक्रेट हो सकता है। मैं सिर्फ आपके मुख से सुनना चाहता हूँ कि आपकी पार्टी ने वैकल्पिक योजना तैयार कर ली है। मुझे स्पष्ट है कि आप एक सत्यनिष्ठ व्यक्ति हैं। आप सिर्फ हाँ कह देंगे तो मैं मान लूंगा, वैकल्पिक ब्लूप्रिंट देखने  की मांग नहीं करूँगा।", मैंने आगे कहा।

गोविन्द जी ने मौन तोड़ते हुए कहा : "नहीं, मैं नहीं कहूँगा कि ऐसा कोई ब्लूप्रिंट तैयार है। समय आने पर वह तैयार कर लेंगे।"

"गोविन्द जी, देखिये, मैं कोई ज्योतिषी तो नहीं हूँ, मगर इतिहास की गति देख कर यह कह सकता हूँ कि आज से 20-25 वर्षों के बाद केंद्र में आपकी सरकार सत्ता में काबिज होगी, क्योंकि कांग्रेस के पतन की प्रक्रिया तब तक भ्रष्टाचार के कारण पूरी हो चुकी होगी, और चूँकि जिस निष्ठा के साथ आपलोग पूरे देश में काम कर रहे हैं, कांग्रेस के द्वारा रिक्त किये गए स्थान को भरने के लिए जनता के सामने आपकी पार्टी तब एकमात्र विकल्प होगी।  उस समय अगर आपके पास पहले से सुविचारित एक वैकल्पिक शिक्षा-व्यवस्था की रूपरेखा नहीं तैयार रहेगी तो आपकी पार्टी कोई परिवर्तन नहीं ला पायेगी।", मैंने गोविन्द जी से अर्ज किया।

"प्रदीप जी, आपने एक कहावत सुनी है : 'शहर सिखावे कोतवाल"।

"गोविन्द जी, देश कोतवाली नहीं है, जो डंडे से चलता हो। यह तो दिमाग से चलता है। मुझे लगता है कि आपकी पार्टी को और गंभीर होने की जरुरत है, वरना सत्ता में आने पर वह विशेष कुछ कर नहीं पायेगी।", मैंने अर्ज किया।

"पद्माकर जी, इन्हें दीनदयाल जी की पुस्तक 'राष्ट्र जीवन की दिशा' दीजिये। उसमें उन्होंने सुन्दर शब्दों में देश में परिवर्तन की दिशा का चित्र खींचा है।", गोविन्द जी ने पद्माकर जी से कहा।

पद्माकर जी भीतर गए और यह पुस्तक ले कर आये और मुझे उपहार-स्वरुप दी। मैंने उलट-पलट कर देखा। उसमे शिक्षा-व्यवस्था पर कोई अध्याय नहीं मिला। मैंने गोविन्द जी को यह बात बताई। उन्होंने कुछ टिपण्णी नहीं की।

बातें और बढ़ें इससे पहले डिनर आ गया। हम लोगों ने भोजन किया और रात हो जाने के कारण अपने-अपने घरों को हो लिए। उसके बाद न तो गोविन्द जी से फिर 2015 तक मुलाकात हुई न उस समय मैं विद्यार्थी परिषद् में शामिल हुआ।

संयोग से जितने दिनों के बाद भाजपा (उस समय 'जनसंघ) की मिसाइल मैंने केंद्र में गिरने की बात कही थी, उतने ही दिनों के बाद भाजपा एन डी ए के मुख्य घटक के रूप में केंद्र में 1998 से 2004 तक सत्तासीन रही। इसी के पाले में शिक्षा-मंत्रालय रहा। भाजपा के एक अत्यंत वरीय नेता प्रोफ़ेसर मुरली मनोहर जोशी केंद्रीय शिक्षा मंत्री रहे, जो मैकॉले की शिक्षा- व्यवस्था को एक इंच भी खिसका नहीं सके। मैंने 2001 के आस-पास राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के अपने कुछ मित्रों से गोविन्द जी से हुई अपनी चर्चा का हवाला देते हुए पूछा कि जोशी जी मैकॉले को हटाने की दिशा में कहाँ तक पहुंचे। उन्होंने बड़े आदरपूर्वक बताया कि जोशी जी बड़ी गंभीरता से वर्तमान शिक्षा-व्यवस्था का अध्ययन कर रहे हैं। मैंने कहा कि जब तक वे अपना अध्ययन पूरा करेंगे तब तक अपना कार्यकाल भी पूरा कर चुके होंगे। वही हुआ। 5 वर्ष रह कर बिना कोई महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किये ही वे चले गए।

गोविन्द जी एक विचारशील व्यक्ति रहे और निश्चय ही उन्होंने पार्टी तक मेरा सन्देश पहुँचाया होगा, मगर यह स्पष्ट है कि पार्टी ने उस दिशा में कुछ नहीं किया।

गोविन्द जी से 1974 का यह वार्तालाप मेरे आने वाले जीवन को आकार देने वाले कारकों में से एक सिद्ध हुआ क्योंकि अब मेरे सामने यह स्पष्ट था कि अगर अगर अपने वायदे निभाने हैं तो सिर्फ अच्छी भावना से बात नहीं बनेगी, बल्कि मेहनत करके, शोध करके, चिंतन और संवाद करके हर महत्त्वपूर्ण क्षेत्र के लिए पहले ही वैकल्पिक कार्य योजना तैयार रखनी होगी, ताकि सत्ता में पहुंचते ही व्यवस्था-परिवर्तन का कार्य शुरू किया  जा सके। अन्यथा जनता को झूठे सब्जबाग दिखा कर सिर्फ सत्ता परिवर्तन किया जा सकेगा, व्यवस्था परिवर्तन नहीं। इसी विचार को आकार देने के लिए मैंने 1998 में देश के कुछ सबसे चिन्तनशील लोगों को लेकर राष्ट्रीय मुद्दों का नागरिक आयोग या द सिटिजंस कमीशन फॉर नैशनल इश्यूज की स्थापना की जिसने 7 राष्ट्रीय मुद्दों पर अच्छा संवाद किया। इसमें तत्कालीन भारतीय प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष न्यायमूर्ति पी बी सावंत, न्यायविद पी एन लेखी, अर्थशास्त्री डॉ ए एम् खुसरो, अंतरिक्ष वैज्ञानिक यू आर राव, श्याम बेनेगल, मल्लिका साराभाई, असग़र अली इंजिनियर, मौलाना वहीदुद्दीन खान और दर्जनों विभिन्न क्षेत्रों के विद्वान शरीक हुए। बाद में 2012 में मेरी पुस्तक 'सम्पूर्ण क्रांति की भूमिका' (अप्रकाशित)  इसी विचार की परिणति थी, जिसमें गरीबी निवारण, शिक्षा, प्रशासनिक सुधार, राजनितिक और चुनावी सुधार आदि 11 विषयों पर व्यवस्था-परिवर्तन का मानचित्र सामने रखने की कोशिश की गयी। कई दशकों तक खींचे इस दशकों लंबे उद्यम में गोविन्द जी से हुई मुलाकात कहीं-न-कहीं पृष्ठभूमि में रह कर वह कार्य पूरा करने को कुरेदती रही जिसकी सलाह मैंने 1974 में गोविन्द जी के माध्यम से तत्कालीन जनसंघ (अब भारतीय जनता पार्टी) को दी थी।

पी के सिद्धार्थ
अध्यक्ष, भारतीय सुराज दल
11 अक्टूबर, 2016

Tuesday, 4 October 2016

स्वामी अग्निवेश के आश्रम में चिंतन शिविर का तीसरा दिन : अंतिम कड़ी

स्वामी अग्निवेश के आश्रम में तीसरा और अंतिम दिन : अंतिम कड़ी।

www.pksiddharth.in
www.suraajdal.org
www.bharatiyachetna.org

जब नेतृत्व विकास और अन्य सम्बद्ध उद्देश्यों के लिए स्वामी अग्निवेश ने आश्रम के उपयोग की सहमति दी और उसे उद्यम का राष्ट्रीय मुख्यालय बनाने तक का प्रस्ताव दे दिया, तो यह उनकी सदाशयता का मैंने पर्याप्त प्रमाण माना। लेकिन अभी मेरी बात पूरी नहीं हुई थी।

मैं : स्वामीजी, आपका प्रस्ताव उत्तम है, मगर कल जो कुछ प्रस्तुतियाँ आपलोगों ने देखीं वे काफी नहीं थीं। एक तो आपलोग समय की कमी के कारण सिर्फ ट्रेलर देख पाये, मगर आप सभी को पूरी बात गंभीरता से समझने के लिए पूरी प्रस्तुति देखनी चाहिए। मगर वह पूरी प्रस्तुति भी पर्याप्त नहीं होगी जब तक आप गीता धाम का वह फ्लायर नहीं देखेंगे जो आप सबों को अभी  दिया गया है।

लोग ध्यान से गीता धाम का वह संक्षिप्त फ्लायर देखते और पढ़ते हैं। उसमें वानप्रस्थियों का समाज सेवा के लिए जो प्रयोग गेरुए परिधान में गीता धाम में करने का प्रस्ताव है, उसे देख कर स्वामी जी कहते हैं : "वाह, यह तो हम बहुत दिनों से करने की सोच रहे थे!"

मैं : आज स्थिति यह है कि न केवल नेता भ्रष्ट हो गए हैं, उन्होंने कई प्रकार से गांव गांव में जनता को भी भ्रष्ट और अकर्मण्य बना दिया है। लोग काम कर के समृद्ध नहीं बनाना चाहते, वे सब कुछ खैरात में पाना चाहते हैं। गरीबी दूर करने के लिए उन्हें दिए गए मार्गदर्शन के अनुसार काम करना पड़ेगा, मेहनत करनी पड़ेगी। वे ऐसा कुछ नहीं करना चाहते।

यानि आप उनकी गरीबी दूर करने में तब तक सक्षम नहीं होंगे जबतक उन्हें भिक्षुक से फिर से एक सामान्य इंसान  नहीं बनाया जायेगा।

स्वामी अग्निवेश : कैसे होगा यह?

मैं : इसके लिए धर्म की सकारात्मक शक्ति का प्रयोग अभी तत्काल एकमात्र बिकल्प है। आतंकवाद धर्म की नकारात्मक शक्ति का उदहारण जरूर है, मगर साथ ही धर्म की शक्ति अभी भी बनी हुई है, इसका भी वह प्रमाण है।

मोहम्मद अजहाउद्दीन : मगर आपका ब्रोशर देख कर शंका होती है। आप गांव गांव में गीता धाम बनाना चाहते हैं?

मैं : केवल गीता धाम नहीं, यथा योग्य इस्लामिक संस्कृति केंद्र, बौद्ध संस्कृति केंद्र आदि भी, जहाँ समुदायों के अपने अपने धर्म ग्रंथों के सकारात्मक संदेशों के माध्यम से सत्य अहिंसा पर आधारित इंसान बनाया जा सके।

रही शंका की बात तो मंदिर-मस्जिद तो रोज ही गांव-गांव में बन रहे हैं जो आदमी को इंसानियत नहीं सिखा रहे, सिर्फ ऊपरी कर्मकांड या नफरत सिखा रहे हैं। हमारे केंद्र तो इंसानियत और सच्ची आध्यात्मिकता सिखाएंगे। फिर शंका क्यों?

राम मोहन राय : बिना धर्म को बीच में लाये हम ये केंद्र क्यों नहीं बना सकते? गरीबी दूर क्यों नहीं दूर कर सकते।

मैं : लोग बना रहे हैं। सफलता नहीं मिल रही कार्यक्रम को तेजी से दूर-दूर तक फ़ैलाने में। आप बिना धर्म को बीच में लाये एक गरीबी निवारण केंद्र बनाइये। मैं सहयोग करूँगा। लेकिन मैं खुद वह नहीं करूँगा क्योंकि वह सेल्फ-सस्टेनिंग नहीं होगा डोनर एजेंसियों से पैसे ले कर होगा। गांव-गांव के लिए पैसे कौन डोनर-एजेंसी देगी?

स्वामी अग्निवेश : मगर इस केंद्र को कोई न्यूट्रल-सा और नाम क्यों नहीं देते?

मैं : आप सुझाईये।

स्वामी अग्निवेश : सोचूंगा। ...(गीत धाम फ्लायर को गौर से देखते हुए) यह ऊपर क्या लिखा है.. "ऑल फेथ काउंसिल फॉर अलिवियेशन ऑफ़ स्पिरिचुअल ऐंड मटेरियल पॉवर्टी" ..?

मैं : जी! इस काउंसिल का काम है सभी धर्मों के माध्यम से उनके धर्मावलंबियों की आध्यात्मिक और आर्थिक गरीबी दूर करना। आज धर्म गरीबी दूर नहीं कर रहे, गरीबी बढ़ा रहे हैं।

गीता धाम, इस्लामिक संस्कृति केंद्र, बौद्ध संस्कृति केंद्र या मसीही संस्कृति केंद्र का मॉडल बिलकुल एक जैसा होगा। सिर्फ धर्मग्रंथों का फर्क होगा।

चूँकि धर्मस्थल होंगे ये, इसलिए इनके लिए जमीन और संसाधन गांव-पंचायत में अधिक आसानी से उपलब्ध हो जाएंगे। मुझे आठ-दस जगह से जमीन के ऑफर मिल चुके। 50 वर्ष से ऊपर के वानप्रस्थी लोग अपनी इच्छा से सेवा देंगे। अतः इन केंद्रों को डोनर एजेंसी से फंड ले कर नहीं चलाना पड़ेगा।

गीता धाम में एक गीता  मंदिर होगा जहाँ लोग गीता-तुलसीरामायण सुनेंगे, ध्यान करेंगे, चैतन्य के भक्ति नृत्य करेंगे। वहां मूर्तियां नहीं होंगी इसलिए लड्डू और माला चढाने के लिए धक्कम-धुक्की नहीं होगी। लोग आराम से बैठ कर धर्म के भीतरी तत्त्वों को हृदयंगम कर सकेंगे।

गीता मंदिर के एक ओर सम्पूर्ण शिक्षा केंद्र होगा जो एक प्रेक्षागृह होगा, जहाँ दीवार पर लगी बड़ी एल ई डी टीवी के माध्यम से खेती से लखपति फ़िल्म-श्रंखला  और अन्य सभी प्रकार की शिक्षा दी जा सकेगी। इनमें हिंदी- अंग्रेजी शिक्षा की पूरी शिक्षामाला फिल्में तैयार हो चुकी हैं।

दूसरी ओर एक रोजगार केंद्र होगा जो तीन वर्षों में उन सभी की गरीबी दूर करने की गारंटी लेगा जो गीता धाम में नित्य आया करेंगे। गरीबी इस केंद्र के माध्यम से तीन वर्षों में कैसे दूर होगी, इस फ़िल्म का ट्रेलर कल आप देख चुके हैं। यह गरीबी निवारण योजना बहुत शोध, अनुभव और चिंतन-मनन के बाद तैयार की गयी है।

स्वामी आर्यवेश : गीता ही पर इतना जोर क्यों?

मैं : वेद विशद हैं। फिर उनमें ज्ञान कम, स्तुतियाँ और कर्मकांड ज्यादा हैं। वे बहुत महंगे भी हैं। उपनिषद भी अनेक हैं। उनमें भी ज्ञान अभी नेबुलस फॉर्म में हैं। गीता छोटी-सी पुस्तक है, सर्वत्र सुलभ है, सस्ती है - अनुवाद सहित दस रुपयों में भी मिल जाती है। जो कुछ ज्ञान वेदों और उपनिषदों में है वह गीता में एकत्र मिल जाता है। इसलिए गीता पर जोर! ऐसा कौन है जो गीता और रामचरितमानस नित्य पढ़े या सुने और इंसान न बने! दस में आठ तो बन ही जाएंगे!

मोहम्मद अज़हरुद्दीन : मगर हिन्दू मुसलमान सभी के लिए एक ही केंद्र नहीं बन सकता?

मैं : अभी इतनी चेतना गांवों में विकसित नहीं हुई है।  हिन्दू धर्मस्थल हुआ तो मुसलमान नहीं जाएंगे; मुस्लिम धर्मस्थल हुआ तो हिन्दू नहीं जाएंगे। सबके लिए एक धर्म स्थल होगा तो कोई नहीं जायेगा। वैसे कुछ दिनों के बाद आप जो चाहते हैं, वैसे प्रयोग भी जरूर किये जाएंगे। सफल होंगे तो आगे बढ़ा जायेगा।

लेकिन गीता धाम के रोजगार केंद्रों में सभी धर्मों के लोग जाना चाहेंगे। इसके सम्पूर्ण शिक्षा केंद्रों में भी। इसी प्रकार इस्लामिक संस्कृति केंद्रों के रोजगार केंद्रों और सम्पूर्ण शिक्षा केंद्रों में सभी धर्म के लोग जा कर लाभ उठाना चाहेंगे।

देखिये, जो शक्य है, हम वही करना चाहेंगे। युग की हवा देख कर काम मैं तो नहीं करना चाहता। गांधी ने धर्म की शक्ति का प्रयोग कर उतना बड़ा आंदोलन खड़ा किया। लोग आलोचना करते रहे। वे सुन कर इग्नोर करते रहे। गांधी ने राम-धुन से अपनी सभाएं शुरू कीं। लोगों ने अलोचना की। उन्होंने अपना पथ नहीं छोड़ा। उनसे अधिक मुसलमानों का पक्ष किसने लिया? इसी लिए उनकी हत्या भी हुई। मुझे आज के दिग्भ्रांत बुद्धिजीवियों से मार्गदर्शन नहीं लेना, हवा में नहीं बहना। मुझे धर्मों - सभी धर्मों - की सकारात्मक ऊर्जा को लेकर लोगों को इंसान बनाना है। बस! इसमें आप सब का सहयोग चाहूँगा!

पी के सिद्धार्थ
22 सितम्बर, 2016

Wednesday, 31 August 2016

मेरे प्रिय मुख्य मंत्री : नृपेन चक्रवर्ती (भाग 2)


पी के सिद्धार्थ
www.pksiddharth.in
www.suraajdal.org

जब मैंने त्रिपुरा राज्य में 1983 में भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी के रूप में योगदान दिया तब नृपेन बाबू 78 साल के थे। 88 वर्ष की उम्र तक वे मुख्य मंत्री रहे। लेकिन उम्र का कोई प्रभाव उनकी कार्यक्षमता पर नहीं दिखा। किसी ने कभी उनकी ईमानदारी पर ऊँगली नहीं उठाई। उनके किसी मंत्री ने कभी कोई रिश्वत ली हो, ऐसा सुनने में नहीं आया। उनके एक विधायक ने एक जीप खरीदी, मगर उसे नृपेन दा से छिपा कर, ढक कर रखता था, ऐसा सुनने में आया।

मगर समाज के अंतिम व्यक्ति के लिए जो वास्तविक संवेदना नृपेन दा के अंदर थी, उसका कोई समानांतर उदाहरण मुझे किसी मुख्य मंत्री के जीवन में नहीं मिला।

मैंने एस पी का पहला चार्ज त्रिपुरा नॉर्थ जिले में ग्रहण किया। कुछ दिनों बाद मुझे देर शाम एक थाना-प्रभारी का फोन मिला। थाना प्रभारी ने बताया कि एक 'घटना' हो गयी है। एक इंटीरियर क्षेत्र में स्थित सी आर पी एफ कैम्प में एक डी एस पी ने एक ट्राइबल की बकरी जबरन ले ली और उसे आधी कीमत ही दी। फिर बकरी खा ली गयी।

इस घटना ने मुझे लज्जित किया। मैंने थानेदार को यह घटना मेरी दृष्टि में लाने के लिए धन्यवाद दिया, और उन्हें यह निर्देश दिया कि वे कैम्प में जा कर डी एस पी से मिलें, और उस ट्राइबल को पूरे पैसे दिलवा दें। कहें, एस पी साहब का आग्रह है। न मानें तो उनके खिलाफ एफ आइ आर दायर कर कानूनी कार्रवाई करें। कल कार्रवाई पूरी कर मुझे इत्तला करें।

अगले दिन थानेदार ने यह पुष्टि की कि उस ट्राइबल की शिनाख्त कर उसे पूरे पैसे दिलवा दिए गए हैं, और उसे कोई असंतोष नहीं है। मैंने थानेदार को फिर धन्यवाद दिया और दूसरे कार्यों में लग गया।

चार या पाँच दिनों बाद मैं जब अपने कार्यालय में सुबह-सुबह अपनी डाक-फोल्डर देख रहा था, तब मैंने मुख्य मंत्री कार्यालय का एक लिफाफा देखा। मैंने लिफाफा आश्चर्य और उत्सुकता के साथ खोला, क्योंकि गंभीर-से-गंभीर विषय पर एस पी के साथ डी जी पी या मुख्य सचिव ही पत्राचार करते हैं। लिफाफे में मेरे नाम से मुख्यमंत्री की एक व्यक्तिगत डेमी-ऑफिशल चिट्ठी मिली। यह चिठ्ठी मेरी किसी व्यक्तिगत फाइल में अभी भी सुरक्षित है। चिठ्ठी में अंग्रेजी में लिखा था कि उन्हें पता चला है कि मेरे जिले में फलाँ गांव में एक गरीब ट्राइबल से उसकी बकरी जबरदस्ती पुलिस वालों ने ले ली और उसे पूरे पैसे भी नहीं दिए। मेरी आँखें इस व्यक्ति के खुफिया तंत्र, जो उनके पार्टी-नेटवर्क पर आधारित था, की पहुँच और तेज गति पर फटी रह गयीं, और दूसरी ओर इस बात पर भी कि एक मुख्य मंत्री के पास इतना समय था कि वह इस मामूली-सी लगने वाली घटना पर एस पी को एक पूरी चिठ्ठी डिक्टेट करे, और स्वयं हस्ताक्षर कर भेजे। मगर हैरानी ख़त्म होते ही ह्रदय इस महापुरुष के प्रति श्रद्धा-भाव से भर गया। फिर यह भी संतोष हुआ कि मैंने यह पत्र प्राप्त होने से पूर्व ही उचित कार्रवाई कर डाली थी। जाहिर था कि यह चिट्ठी घटना के दिन ही लिखी गयी थी, क्योंकि समाधान तो दूसरे ही दिन करा दिया गया था। मैंने तुरंत पत्र का उत्तर लिख कर मुख्यमंत्री कार्यालय विशेष दूत से भेजा, और ईश्वर को धन्यवाद दिया कि उन्होंने मुझ तक भी घटना की खबर सही समय पर पहुंचाई, और तत्काल समाधान करने की प्रेरणा भी दी।

काश किसी गरीब और असहाय नागरिक की पीड़ा हमारे अन्य मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों के दिल में नृपेन दा की तरह थोड़ी  भी सच्ची संवेदना उत्पन्न कर पाती!

पी के सिद्धार्थ