https://youtu.be/i4WU1KYBF7A
Tuesday, 20 December 2016
Monday, 19 December 2016
शंकरन भाग 3
मेरे प्रिय आइ ए एस अधिकारी : एस आर शंकरन (भाग 3)
पी के सिद्धार्थ
अध्यक्ष, भारतीय सुराज दल
मुख्य सचिव किसी राज्य का सबसे व्यस्त अधिकारी होता है क्योंकि वह पूरे राज्य के प्रशासन का मुखिया होता है, और उसे सभी विभागों को देखना पड़ता है। कहना न होगा कि श्री शंकरन भी, स्वाभाविक रूप से, एक अत्यंत व्यस्त अधिकारी थे। लेकिन अपनी सारी व्यस्तताओं के बीच भी नए आईएएस अधिकारियों को भविष्य के लिए तैयार करना एक ऐसा विषय था जिसकी और उनका ध्यान हमेशा रहता था। वह अपने तरीके से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर उन्हें प्रशिक्षित करते रहते थे। आज के मुख्य सचिवों को न तो इसके लिए समय रहता है ना इसके लिए उनकी कोई प्रवृत्ति बनती है।
मुझे याद है कि एक बार राज्यभर के एसडीओ स्तर के अधिकारियों की एक गोष्ठी उन्होंने बुलाई थी। सुबह तड़के कैलाशहर से निकल कर साढ़े चार घंटे की यात्रा कर नए-नए एस डी ओ बने एक आई ए एस अधिकारी गोष्ठी में अगरतला साढ़े दस बजे दिन में पहुंचे। गोष्ठी से निवृत्त हो दिन का भोजन कर तुरंत उत्तर त्रिपुरा जिले के मुख्यालय कैलाशहर की और अपनी जीप में लौट पड़े। कैलाशहर का रास्ता पहाड़ियों के बीच से घाटियों, जंगलों और घुमावदार सड़कों से होता हुआ निकलता था। जंगलों में वहां हाथी बहुत हुआ करते थे। कोई 'भला' मुख्य सचिव होता तो युवा अधिकारी को कहता कि थोडा शहर अगरतला में सिनेमा वगैरह देख कर कल सुबह चले जाना। मगर यहाँ तो मुख्य सचिव का फरमान था कि अपने कार्य क्षेत्र से मीटिंग के लिए आइए और उलटे पांव वापस जाइये। कैलाशहर जाते हुए रास्ते में भूस्खलन के कारण एक पहाड़ ने गिरकर सड़क मार्ग अवरुद्ध कर रखा था, इसलिए एसडीओ साहब वहां से बीच में ही लौटकर अगरतला वापस आ गए। मुख्य सचिव को खबर मिलने पर वे गलत न समझ जाएं, इसलिए उन्हें फोन कर एस डी ओ साहब ने अगरतला में रात्रिविश्राम की अनुमति मांगी। जवाब में मुख्य सचिव ने उन्हें यह कहा कि तुरंत वापस लौटें और भू-स्खलन की जगह जा कर तब तक खड़े रहें जब तक मिट्टी हटा कर सड़क खोल नहीं दी जाती। युवा आई ए एस अधिकारी को उल्टे पांव वापस जाना पड़ा, और सड़क अवरोध के स्थल पर लगातार रात भर खड़े रहकर सम्बद्ध एजेंसियों को एकत्र कर उनके माध्यम से उन्हें सड़क का अवरोध दूर करा कर दूसरे दिन दोपहर मर आगे कैलाशहर की ओर बढ़ना पड़ा।अगर एस डी ओ साहब वहां रात भर खड़े होने का कष्ट नहीं करते, और दबाव दे कर रात भर पथ निर्माण विभाग और बोर्डर रोड संगठन आदि पर दबाव डाल कर कार्य नहीं कराते, तो सुबह तक सड़क नहीं खुल पातीं और अगले दो-तीन दिनों तक अगरतला देश से कटा रहता। लेकिन रात में पहड़ियों के बीच उस घने जंगल के मध्य में सड़क पर हाथियों का झुण्ड पहुँच जाता तो इस युवा अधिकारी की जान भी जा सकती थी। मगर शंकरन की यह सोच थी कि जान जोखिम में डालना सिर्फ सरहद पर सेना के जवानों का काम नहीं है, और आई ए एस अधिकारियों का काम सिर्फ मौज करना नहीं है। उन्हें भी लोक सेवा के लिए जोखिम उठाने के जरुरत होती है।
नौकरी से सेवानिवृत्त होने के बाद श्री शंकरन ने आंध्रप्रदेश में सामाजिक कार्यों में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे उन कुछ अधिकारियों में थे जिन्हें पीपुल्स वार ग्रुप ने बंदी बनाया था, लेकिन उन्हें नुकसान नहीं पहुंचाया। सफाई कर्मचारियों के एक बड़े आंदोलन का उन्होंने नेतृत्व आंध्र प्रदेश में किया।समूचे आंध्र प्रदेश में वे सभी के द्वारा समादृत रहे। भारत सरकार ने उन्हें पद्मभूषण से अलंकृत किया लेकिन यह पुरस्कार लेने से उन्होंने मना कर दिया। वे हमेशा एक निस्पृह कर्मयोगी रहे।
वे आंध्र काडर के थे और त्रिपुरा प्रतिनियुक्ति या डेपुटेशन पर आए थे। उनकी ईमानदारी की ख्याति सुनकर नृपेन चक्रवर्ती ने उन्हें त्रिपुरा में बुलाकर मुख्य सचिव बनाया था। इस प्रकार के ईमानदार और निर्भीक व्यक्ति को मुख्य सचिव बनाने का जोखिम सिवाय नृपेन दा के और कोई मुख्यमंत्री नहीं उठा सकता था। आज जब यह देश न केवल राजनेताओं बल्कि वरीय अधिकारियों के भ्रष्टाचार और कार्य संस्कृति के अभाव का पीड़ित है, शंकरन-जैसे आई ए एस अधिकारियों की कमी बहुत खटकती है। अब जब श्री शंकरन नहीं रहे, देश की ब्यूरोक्रेसी का इतिहास यह पूछता रहता है : 'कहां गए वे लोग'?
पी के सिद्धार्थ
20 दिसंबर, 2016
www.pksiddharth.in
www.suraajdal.org
www.bharatiyachetna.org
Sunday, 18 December 2016
Press Release on gang rape and murder
प्रेस रिलीज़
विषय : रांची में 19 वर्षीय छात्रा का गण-घर्षण और नृशंश हत्या।
सारांश : पुलिस, न्यायपालिका और शिक्षा व्यवस्था की सम्पूर्ण विफलता फिर उजागर; गृह मंत्री इस्तीफा दें या ठोस पहल कर पुलिस रिफॉर्म लागू करें; गैंग-रेप के अपराधियों के लिए कैस्ट्रेशन की व्यवस्था हो।
परसों रांची की बूटी बस्ती में जो नृशंश हत्या कांड हुआ, उसके मुतल्लिक आज इस बात की अनौपचारिक पुष्टि भी हो गयी कि यह गण-घर्षण या गैंगरेप का भी मामला है। अन्य घटनाओं के साथ मिला कर देखा जाय तो यह राज्य की लचर विधि-व्यवस्था का एक और ज्वलंत उदाहरण है। पिछले एक महीने में स्त्रियों को जिन्दा जलाये जाने की राज्य में यह चौथी घटना है। अपराधों को नियंत्रित करने में पुलिस की विफलता की जिम्मेवारी लेते हुए राज्य के गृह मंत्री को या तो इस्तीफा देना चाहिए, या आगे ठोस कदम उठाने चाहिए।
भारतीय सुराज दल ने राज्य के गृह मंत्री को पत्र लिख कर इस सन्दर्भ में निम्नलिखित 10-सूत्री मांगें रखी हैं :
1) एक ऐसी एस आई टी का गठन हो जिसमे नियुक्त अधिकारी सिर्फ इसी मामले की तफ्शीश करें। उनपर और कोई दायित्व न हो, जैसा कि ब्रिटिश 'सीरियस क्राइम ट्रैकिंग सिस्टम' के तहत सफलतापूर्वक किया जाता रहा है। अभी इस SIT में पार्ट-टाइम अधिकारी रखे गए हैं।
2) सरकार गैंग रेप, गैंगरेप-सह-हत्या, डायन के नाम पर स्त्री-हत्या और स्त्री-दहन (वुमन-बर्निंग) के मुकदमों की सुनवाई के लिए डेजिग्नेटेड फास्ट ट्रैक कोर्ट बहाल करे जो लगातार सुनवाई कर हफ़्तों में अंतिम निर्णय दिया करे।
3) सरकार उच्च न्यायलय से यह आग्रह करे कि अपने नियम बदल कर अत्यंत गंभीर और संवेदनशील मामलों को वरीयता क्रम में ऊपर लेकर दिन प्रति दिन की सुनवाई कर उनका त्वरित निष्पादन करे।
4) स्कूली शिक्षा पाठ्यक्रम में स्त्री की गरिमा और उस गरिमा को नष्ट करने पर कठोर दंडात्मक क़ानूनी प्रावधानों से सभी को परिचित कराया जाय।
5) आदतन बलात्कार और गैंगरेप-के अपराध असंदिग्ध रूप से प्रमाणित होने पर अन्य डंडों के अलावा प्रौढ़ वयस्कों के 'कैस्ट्रेशन' (टेस्टिकल हटाना) का कानूनी प्रावधान भी किया जाय। यह प्रावधान अमेरिका के कई प्रांतों में और कई विक्सित देशों में वैकल्पिक या स्वतंत्र दंड के रूप में लागू है। संविधान की धारा 254 (2) के तहत केंद्रीय कानूनों में ऐसे संशोधन का अधिकार राज्यों को है। संविधान के सातवें शेड्यूल की तीसरी सूची (समवर्ती सूचि) की प्रथम और द्वितीय प्रविष्टियाँ इसे और स्पष्ट करती हैं कि IPC और CrPC में परिवर्तन का स्पष्ट अधिकार राज्यों को है।
6) सामान्य विधि व्यवस्था को चुस्त करने के लिए राँची में पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू की जाय।
7) विधि-व्यवस्था और अपराध-अनुसन्धान के लिए पुलिसबल का अलगाव जल्द से जल्द किया जाय ताकि अपराधों का उचित और त्वरित अनुसन्धान संपन्न हो सके। त्वरित अनुसन्धान और त्वरित दंड से ही अपराध रुक सकते हैं।
8) वी आई पी सुरक्षा को स्केल डाउन कर अधिक पुलिस कर्मियों को विधि व्यवस्था और अनुसन्धान कार्य में लगाया जाय।
9) हर गंभीर अपराध को रोकने के लिए जो सबसे बड़ा कदम है वह है नशा बंदी। राज्य में तुरंत नशाबंदी लागु की जाय।
10) सूबे के गृह मंत्री या तो पुलिस रिफॉर्म करें और ये ठोस कदम उठाएं या इस्तिफा दें।
पी के सिद्धार्थ
अध्यक्ष, भारतीय सुराज दल
17 दिसंबर, 2016
Saturday, 17 December 2016
शंकरन (भाग 2)
मेरे प्रिय आइ ए एस अधिकारी : एस आर शंकरन (भाग 2)
पी के सिद्धार्थ
अध्यक्ष, भारतीय सुराज दल
आजकल जब नए आई ए एस प्रोबेशनर ज्वाइन करते हैं तो यह बातचीत करते सुने जाते हैं कि फलां मुख्य सचिव ने कितने करोड़ कमाए, कितने फ़ार्म हाउस कहाँ-कहाँ खरीदे। जाहिर है कि जब वरीय पदो पर ये प्रशिक्षु जाएंगे तो उन्हें ऐसे ही मुख्य सचिवों के पदचिंहों पर चलने की प्रेरणा मिलेगी। यही आज सर्वत्र घटित भी हो रहा है। अपवादों की बात अलग है। यही सामान्य मनोविज्ञान है। सरकार में भ्रष्टाचार और जन-निष्ठा हमेशा पानी की तरह ऊपर से नीचे की ओर प्रवाहित होते हैं।
मगर त्रिपुरा में यदि मुख्य सचिव के बारे में कोई चर्चा होती थी तो बस इतनी-सी कि वे कैसे कभी-कभी दो केले खा कर पर अपना लंच खत्म कर लेते थे, और कितनी सादगी से रहते थे। उनकी देखा-देखी और उनकी प्रेरणा से जिले के कई कलेक्टर भी दूरस्थ गांवों तक पैदल यात्रा करते थे, और वहां के आदिवासियों की समस्या और विकास के कार्यक्रमों के कार्यान्वन का जायजा स्वयं लेते थे।
जैसे राज्य के विधायकों और मंत्रियों में मुख्यमंत्री नृपेन चक्रवर्ती का खौफ रहता था, वैसे ही राज्य की सभी सेवाओं के अधिकारियों में मुख्य सचिव का खौफ रहा करता था। ध्यान रहे कि एक राजनेता या एक वरीय सरकारी अधिकारी का खौफ अपने अधीनस्थों पर तभी अच्छा होता है जब उसके साथ आदर की भावना भी जुड़ी होती है।अगर यह खौफ सिर्फ दंडात्मक कार्यवाही के कारण उत्पन्न होता है, तब उस तरह की प्रशासन-शैली पर कई तरह के प्रश्नचिह्न लगते हैं।
शंकरन का आदेश था कि कोई अधिकारी लंच के लिए घर नहीं जाएगा, और कार्यालय में ही लंच करेगा। इस आदेश का सर्वत्र पालन होता था। शंकरन के बाद जो भी मुख्य सचिव आये, किसी के कर्यकाल में इसका पालन नहीं हुआ, हालाँकि सरकारी आदेश कागज पर वे ही थे, जबकि शंकरन के जाने के बाद भी कुछ दिनों तक नृपेन दा ही मुख्यमंत्री थे। अतः यह कार्यसंस्कृति सिर्फ नृपेन दा की नहीं बल्कि शंकरन की देन थी।
ऑफिस में खाने के आदेश के कारण मुझे भी घर से ही खाना लाना पड़ता था। मेरे खाने की डोलची कुछ विशेष होती थी, इसका मुझे कोई अहसास नहीं था। मगर कुछ ही दिनों में यह प्लास्टिक की जाली वाली बड़ी-सी नीली डोलची पुलिस मुख्यालय में, और सचिवालय में भी, प्रसिद्ध हो गयी, क्योंकि मेरी डोलची में थर्मस में सूप, जूस, और कई तरह के पकवान हुआ करते थे। मेरे कई वरीय साथी मेरे साथ लंच करने मेरे कमरे में आने लगे। उनकी छोटी-सी टिफिन बहुत सामान्य सी होती थी - दो-चार रोटियां और एक-आध सूखी भाजी। जल्द ही उन्होंने अपनी पत्नियों से शिकायत शुरू की, जिसके बाद पुलिस अधिकारियों की पत्नियों ने एक सभा बुला कर मेरी श्रीमती जी को बहुत नसीहतें दीं कि उनके द्वारा परंपराएं ख़राब की जा रही थीं। मगर मेरा लंच पूर्ववत 'संपचुअस' बना रहा। शंकरन के जाने से मुझे तात्कालिक फायदा यह हुआ कि मेरे मित्र अपने घर जा कर दिन का भोजन करने लगे (और थोडा दिन का आराम भी)। इससे मेरे 'टिफिन' पर उनका अतिक्रमण बंद हुआ, और मैंने फिर से अपने दिन के भोजन का निर्विघ्न आनंद उठाना शुरू किया। मगर मेरा फायदा भले हुआ हो, राज्य का नुकसान हुआ।
मुख्य सचिव का आदेश था कि कोई डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट या एसपी अपना जिला बिना उनकी अनुमति के नहीं छोड़ेगा। इस आदेश का पालन भी होता रहा मगर पूरी तरह नहीं। मैंने पाया कि मेरे जिले के युवा कलेक्टर और युवा एसपी अपनी पत्नियों के साथ बीच-बीच में छुपकर अगरतला निकल जाते थे सिनेमा देखने के लिए। साउथ डिस्ट्रिक्ट मुख्यालय से अगरतला सिर्फ एक-डेढ़ घंटे की दूरी पर था, इसलिए सिनेमा देख कर तुरत वापस जिला-मुख्यालय लौट आना संभव था। मगर वे यह सुनिश्चित करते थे कि उनकी गाड़ियां छुपे हुए स्थान पर पार्क हों ताकि मुख्य सचिव के संज्ञान में यह बात न आए।
मुख्यमंत्री नृपेंद्र दा और मुख्य सचिव श्री शंकरन में से कोई भी दबंग नहीं था, और कड़ी भाषा का प्रयोग नहीं करता था। दोनों मितभाषी थे। दोनों का समान आदर राज्य में था, और दोनों के खौफ के पीछे उनकी नैतिकता और उनके स्वच्छ चरित्र का बल था। देश में कहीं भी एक साथ ऐसा मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव नहीं हुआ होगा।
मुख्य सचिव को यह स्वतंत्रता मुख्यमंत्री ने दे रखी थी कि वह कोई भी निर्णय आवश्यकता पड़ने पर ले लें, और बाद में उस का अनुमोदन मुख्यमंत्री से करा लें। लेकिन इस स्वतंत्रता का दुरुपयोग कभी शंकरन साहब ने नहीं किया। सभी मंत्री मुख्य सचिव का बहुत लिहाज करते थे। सभी मंत्रियों को नृपेन दा का यह निर्देश था कि कभी मुख्य सचिव को अपने कमरे में न बुलाएं। कभी-कभी गोष्ठियों में जब मुख्यमंत्री एक हद पार कर जाते थे तो मुख्य सचिव उनको संभालकर रोक लेते थे और उनकी बात विनम्रता पूर्वक काट भी देते थे।
मैंने सुना कि आंध्र प्रदेश में एक बार शंकरन साहब ने सरकार के करोड़ों रुपए बिना सरकार की अनुमति के जल्दी-जल्दी में शायद अकाल जैसी स्थिति वाले जिलों के लिए बजट के एक मद से मोड़कर दूसरे मद में खर्च कर दी थी। यह कार्य अगर दूसरे किसी अधिकारी ने किया होता तो वह अपनी नौकरी खो बैठता। लेकिन क्योंकि यह कार्य जनहित के लिए स्थिति की तात्कालिकता को देख कर किया गया था, और सरकारी रेट टेप से बचने के लिए किया गया था, इसलिए उन पर कोई कार्यवाही नहीं की गई। ऐसा जोखिम भरा कार्य शंकरन साहब जैसा ईमानदार और संवेदनशील अधिकारी ही कर सकता था।
मुझे वह दृश्य आज तक याद है जब शंकरन साहब त्रिपुरा में अपना कार्यकाल पूरा होने पर सभी अनुमंडलों का भ्रमण कर रहे थे, और अपने अधिकारियों का धन्यवाद ज्ञापन कर रहे थे। इसी क्रम में वे सबरूम अनुमंडल में भी आए जहां पर मैं अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी था। डाकबंगले में हुई गोष्ठी में तब मैंने खड़े हो कर उनसे यह कहा था कि यह बहुत अन्यायपूर्ण है कि हम होमगार्डों से पुलिस के सिपाहियों जैसा बहुत सारा कार्य लेते हैं और उन्हें सिपाहियों की अपेक्षा बहुत कम पगार देते हैं। निश्चित रुप से होमगार्ड के सिपाही पुलिस के सिपाहियों का विकल्प नहीं हो सकते क्योंकि वे निशस्त्र हुआ करते हैं। लेकिन इन दोनों के वेतन में इतनी बड़ी खाई होना उचित नहीं था। उन्होंने मुझे देर तक देखा। वे बहुत बोलते नहीं थे। लेकिन उन्होंने धीरे से कहा कि सरकार के पास इतने पैसे नहीं हैं कि वह इतनी बड़ी संख्या वाले होमगार्ड बल को बहुत अधिक पैसे दे सके। फिर भी वे देखेंगे कि क्या कर सकते हैं। स्थानांतरित हो चुका कोई मुख्यसचिव इतना बड़ा निर्णय लेने की स्थिति में नहीं होता। मगर जाने के पूर्व उन्होंने होमगार्ड का वेतन बढ़ाने के प्रस्ताव को कैबिनेट से पास करा कर चिठ्ठी प्रेषित करवा दी। गजब की विश्वसनीयता थी उनकी!
पी के सिद्धार्थ
17 दिसंबर, 2016
www.pksiddharth.in
www.suraajdal.org
www.bharatiyachetna.org
Friday, 16 December 2016
मेरे प्रिय आइ ए एस अधिकारी : एस आर शंकरन
मेरे प्रिय आइ ए एस अधिकारी : एस आर शंकरन
पी के सिद्धार्थ
अध्यक्ष, भारतीय सुराज दल
व्यक्ति के निर्माण में और उसके चरित्र को आकार देने में 'रोल मॉडल्स' या आदर्श व्यक्तियों की अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। मेरा कई मायनों में यह सौभाग्य रहा कि आई पी एस का अपना प्रशिक्षण हैदराबाद में पूरा करने के बाद मुझे त्रिपुरा काडर आवंटित हुआ, जहाँ मुझे कई ऐसे विरल चरित्र मिले, जिनसे बहुत-कुछ सीखा जा सकता था।
1983 में त्रिपुरा पहुँचने के बाद जिन तीन प्रमुख अधिकारियों से मेरा सरोकार पड़ा वे थे पुलिस महानिदेशक (DGP), मुख्य सचिव (Chief Secretary) और मुख्य मंत्री। इनमे से दो लोग अविवाहित थे और आदर्श रूप से ईमानदार थे - मुख्य सचिव एस आर शंकरन और मुख्य मंत्री नृपेन चक्रवर्ती। (विवाहित लोग मेरी बात का गलत मतलब नहीं निकालें; अविवाहित होने और ईमानदार होने में ज्यादा गहरा सम्बन्ध नहीं है।)
नए आईपीएस या आइ ए एस प्रोबेशनर्स जब राज्य में योगदान देते थे तो पुलिस महानिदेशक, मुख्य सचिव और मुख्य मंत्री से जरूर मिलते थे जिसे 'कॉल ऑन' कहा जाता था। अतः मैं भी अपनी औपचारिक पोशाक में, अर्थात वर्दी में, मुख्य सचिव श्री एस आर शंकरन से समय ले कर मिला। उनके कमरे में प्रवेश करने पर मैंने पाया कि मेरे सामने सूट-बूट में एक साधारण कद-काठी वाला इंसान बैठा था। चेहरे पर गंभीरता थी मगर उसके पीछे छिपी सदाशयता और करुणा मेरी निगाहों से छिपी नहीं रही। एक टिपिकल ब्यूरोक्रैट का अहं उस चेहरे की गंभीरता में कहीं परिलक्षित नहीं हुआ। उन्होंने खड़े हो कर हाथ मिलाया, और मुझे बैठने को कहा। तमिलनाडु में जन्मे आँध्रप्रदेश काडर के श्री शंकरन कॉफी के बड़े शौक़ीन थे। उन्होंने कॉफी मंगाई और मुझे सहज किया।
जब तक कॉफी तैयार होती, उन्होंने मेरी पृष्ठभूमि के बारे में पूछना शुरू किया। यह भी कि समाज के गरीब तबकों के विषय में मैं क्या जानता-सोचता था। मैंने कहा, व्यक्तिगत रूप से मैंने कभी गरीबी नहीं देखी-भोगी, मगर अपने जन्मदिन के अवसर पर कभी-कभी बूट पॉलिश करने वालों को किसी रेस्तरां में ले जाकर उनके साथ भोजन करता था। मगर निश्चित रूप से उनके बारे में अधिक नहीं जानता। शंकरन मेरी बातों से संतुष्ट दिखे। तबतक मुझे यह पता नहीं था कि अंगरेज़ी सूट-बूट में मेरे सामने बैठा हुआ यह व्यक्ति गरीबों का कितना बड़ा मसीहा था। पुलिस अकैडमी में मेरे द्वारा गुजारे गए दिनों में कभी इस तरह की, यानी गरीब और सुविधाविहीन तबकों के बारे में, कोई चर्चा किसी अधिकारी ने क्लास रूम में या बाहर कभी भी नहीं की थी। इसलिए मेरे लिए यह नया अनुभव था। मैं 'बड़ा' अफसर था, और वे मुझसे और भी 'बहुत बड़े' अफसर थे। भला इतने बड़े अफसर क्या गरीब-गुरबा लोगों के बारे में बातें कर अपना समय ख़राब करते हैं, ऐसी सामान्य प्रतिक्रिया अधिकांश अग्रेज़ीदां संभ्रांत अफसरों की होती, मगर इस प्रकार की वार्ता से पहली ही मुलाकात के बाद मेरी श्रद्धा इस अफसर के प्रति स्थिर हो गयी।
बाद में श्री शंकरन के विषय में अधिक जानकारी दूसरे वरीय साथियों से मिली तो मेरी इज्जत उनके प्रति और बढ़ गयी। मुझे बताया गया कि कैसे उन्होंने रेड करा-करा कर बंधुआ मजदूरों को कई प्रदेशों के ईट-भट्ठों से मुक्त कराया था; कैसे वे बीच-बीच में सारे विभागों के सर्वोच्च अधिकारीयों की टीम लेकर 50-60 किलोमीटर पैदल चल कर पहाड़ों के बीच बसने वाले सबसे दूरस्थ गांवों में जाते थे जहाँ तक सड़कें नहीं जाती थीं, और जहाँ आधुनिक सभ्यता से नितांत अपरिचित ऐसे आदिवासी समुदाय रहा करते थे जिन्होंने जीवन में कभी पक्की सड़क के दर्शन नहीं किये थे।
पी के सिद्धार्थ
16 दिसंबर, 2016
www.pksiddharth.in
मिडिया की अपनी संप्रभुता
'भारत की संप्रभुता की सुरक्षा में मिडिया की भूमिका' विषय पर झारखण्ड जर्नलिस्ट असोसिएशन के वार्षिक अधिवेशन के दौरान हजारीबाग में एक सेमिनार किया गया। इसमें मेरे द्वारा दिए गए की-नोट अड्रेस का एक अंश, जो मिडिया की अपनी संप्रभुता या स्वायत्तता के विषय में है। नीचे लिंक है।
https://youtu.be/cN3uMsTuHQo
Wednesday, 14 December 2016
राजेन्द्र सिंह के आश्रम में दी दिन : भाग 3
जलपुरुष राजेंद्र सिंह के तरुण भारत आश्रम में दो दिन : भाग 3
पी के सिद्धार्थ
अध्यक्ष, भारतीय सुराज दल
मैं लंच के लिए पहुंचा तो सब्जी निकाली। दूर से देखने में हरे बीन्स की सब्जी लगी। लेकिन जब नजदीक से देखा तो मोटी हरी मिर्च की सब्जी थी। मैं हैरान रह गया क्योंकि शुद्ध मिर्च की सब्जी कभी देखी-सुनी-खायी नहीं थी। मैंने आदर के साथ सब्जी को वापस उसके कंटेनर में रखा। राजस्थान की एक बड़ी विशेषता है वहां की मीठी तहजीब भरी जुबान। इतनी तीखी मिर्च खा कर इतनी मीठी जुबान! यह एक संयोग था, या कोई कार्य-कारण सम्बन्ध भी है? अगर है, तो मिर्च की सब्जी हरयाणा और बिहार के कुछ क्षेत्रों में भी खानी शुरू करनी चाहिए। फिर राजस्थान में बेरंग मरुभूमि क्षेत्र बहुत है। मगर वहां की पोशाक में अद्भुत रंग होते हैं। पहले दिन छत पर जब पहुंचा तो मुझे एकदम ललछौंह साफा (पगड़ी) पहनाया गया। मैं पहले से ही सवा छह फुट का हूँ। साफा पहन कर सात फुट का हो गया। ये तो पंजाब के लंबे-से इब्राहिम भाई थे जिन्हें एक पूरी साड़ी जैसे लंबे कपडे को एक सुदर्शन शैली के शाही साफे में तब्दील करना आता था। इस साफे के साथ मेरी जो फोटो प्रसारित हुई तो जीवन में पहली बार मुझे कॉंप्लिमेंट्स प्राप्त हुईं। जिन्हें अभी तक नहीं मिली हों, उन्हें राजस्थानी पगड़ी ट्राई करनी चाहिए। शायद सफलता मिले। महासचिव कमलेश कुमार गुप्ता को विशेष रूप से मैंने राजशथानी साफा ट्राई करने की सलाह दी है।
आश्रम के सभी कर्मचारियों-अधिकारियों को मैंने मृदुभाषी और सद्व्यवहारी पाया। आश्रम में 125 लोग ठहरे थे मगर व्यवस्थापकों में कहीं कोई तनाव या भागा-भागी नज़र नहीं आई। पर्याप्त कमरे हैं, और उचित संसाधन हैं। रमणीय वातावरण है। प्रशिक्षण या सभाओं के लिए एक हॉल भी है, मगर सभाएं सुबह तो एक लंबी-चौड़ी छत पर होती हैं, और धूप कड़ी होने पर नीचे लंबे-चौड़े बरामदे पर, जो हरे पेड़ों से घिरा हुआ है, इसलिए धूप-छांव का एक सुखद मिश्रण प्रस्तुत करता है। रात आने पर और ठंढ बढ़ने पर हॉल के भीतर सभाएं हो जाती हैं। हॉल में एक रंगमंच भी बना हुआ है, जो आश्रम की सांस्कृतिक रुझान की ओर संकेत करता है। वास्तव में पूरे कार्यक्रम की एक बहुत बड़ी विशेषता रही हर दिन दो नुक्कड़ नाटक। राजेन्द्र सिंह के साथ नजदीकी से जुड़े युवा साथी संजय के पास विलक्षण क्षमता है 10 मिनट में एक नुक्कड़ नाटक का स्क्रिप्ट लिखने की। जिस सामाजिक न्याय या पर्यावरण के मुद्दे पर राजेंद्र भाई ने कोई नाटक दिखाना चाहा, संजय ने न केवल तुरंत स्क्रिप्ट लिखा, बल्कि प्रतिभागी युवाओं और वृद्धों-वयस्कों को तुरत प्रशिक्षित कर नाटक का मंचन भी करा दिया।
राजेन्द्र भाई सुबह 6 से रात्रि 11 बजे तक लगातार कार्यक्रम संचालित करते देखे गए। देश के हर कोने से लोग आए थे, और प्रतिभागियों का स्तर अत्यंत उन्नत था। ज्यादा क्रियावादी पर्यावरण से सम्बद्ध थे, उसमे भी विशेष रूप से जल से जुड़े हुए। मगर अन्य मुद्दों से जुड़े विद्वान और प्रतिभागी भी थे। भाई चंद्रशेखर प्राण , जो पंचायती राज के विशेषज्ञ हैं, ने लगभग पांच घंटे 'तीसरी सरकार' पर भाषण दिया और प्रस्तुति की जो बहुत ही ज्ञानवर्धक थी। ऐसा उन्होंने मेरे सत्र को 'किल' करके किया, जिसका खामियाज़ा भी उन्हें दूसरे रूप में भुगतना पड़ा। महाराष्ट्र की प्रतिभा बहन ने भी कुछ घंटों के लिए शिवाजी की मराठा तलवार के साथ आकर (और चला कर) शिरकत की। पुणे से ज्ञान प्रबोधिनी की टीम भी उपस्थित थी, जिसने काफी प्रबोधित किया। इस पूरे गंभीर माहौल को बीच- बीच में सहज और सरस करने में इब्राहिम भाई की मीठी जुबान और हास्यपरक हस्तक्षेप ने सुन्दर भूमिका निभाई। पूरे कार्यक्रम का संचालित करने का दायित्व सबसे वरीय लोगों में से एक रमेश भाई को दिया गया था। उन्हें कुछ लोगों ने मेरे कान में फुसफुसा कर हिटलर का अवतार बताया। मगर यह ज्यादती थी। उनमें यह क्षमता है कि वे दिए गए समय से अधिक भाषण देने वाले को बेबाक तरीके से रोकते हैं, भले ही भाषण देने वाला बुरा मान जाए; और रमेशजी भाई चंद्रशेखर प्राण के अलावा लगभग सभी मामलों में सफल रहे। प्राण साहब उनके दशकों-पुराने मित्र रहे हैं, इसलिए उनके मामले में वे दूसरी और देखते रहे; उन्हें रोकने की कोशिश नहीं की। स्पष्ट था कि रमेश भाई लोक सभा के स्पीकर पद के लिये अच्छे उम्मीदवार थे। (क्रमशः)
पी के सिद्धार्थ
14 दिसंबर, 2016