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Friday, 28 October 2016

इंसान और पशु पक्षी भाग 9

इंसान और पशु-पक्षी : भाग 9

पी के सिद्धार्थ
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(शेरों से जोई की मीटिंग के बाद)

अभी खूंखार जंगली शेरों से अपनी मुलाकात के सदमे से पूरा उबर नहीं पाया हूँ। अगली मीटिंग कहीं मगरमच्छों से न करा दे यह सनकी मैनिमल, यह डर बना हुआ है। जानवरों का क्या ठिकाना! कब उनका जानवरपना जग जाये!

जोई धीरे-धीरे धरती पर उतरने लगता है।

मैं नीचे देखता हूँ। यह तो एक शहर लग रहा है! दिन का समय है, लोग उड़ते हुए कुत्ते को देख लेंगे तो हंगामा मच जायेगा। किसी ने फ़ोटो खींच ली और मनेका गांधी को भेज दी तो एक जानवर की पूंछ के साथ ज्यादती करने के लिए वे मेरे ऊपर मुकदमा भी कर सकती हैं।

मैं : जोई, ये तुम क्या कर रहे हो, दिन का समय है, शहर में न उतरो।", मैं जोई से कहता हूँ।

जोई : समझ रहा हूँ। मैं शहर से हट कर एक बड़े राजनीतिक नेता के फार्म हाउस में उतारूँगा। शहर के लोग नहीं देख पाएंगे। उस फार्म हाउस में पेड़ों का अच्छा झुरमुट है। वहां पिंजरों में चिड़ियों का एक बहुत अच्छा कलेक्शन है। वहां मैं चिड़ियों से बातें करने कभी-कभी आता हूँ। एक साथ इतने तरह के पक्षियों का संग्रह कहीं और देखा नहीं। जरा चिड़ियों को हेलो कर के निकलते हैं।

मैं : संभल कर, शहर के ऊपर से न निकलो।

जोई शहर से किनारे हो कर निकलता हुआ फार्म हाउस में उतरता है। यहाँ जंगल-जैसा पेड़ों का एक झुरमुट है। लेकिन लगता है फार्म हाउस के मैदान में कोई बड़ी मीटिंग चल रही है, क्योंकि लाउडस्पीकर की आवाज़ें आ रही हैं।

"दोस्तो, मजदूरों का शोषण दुनिया भर में इसलिए होता रहा क्योंकि वे कमजोर हैं, संगठित नहीं। उन्हें इज्जत नहीं मिलती क्योंकि वे शारीरिक श्रम करते हैं, और शारीरिक श्रम करने वालों की इज्जत नहीं की जाती है। न केवल मजदूर, बल्कि जो भी वर्ग कमजोर है उसका शोषण होता है। औरतों का भी बहुत शोषण हुआ है। वह भी इसीलिए क्योंकि औरतें मर्दों से कमजोर होती हैं।

इसलिए, अगर शोषण से मुक्त होना है तो देश के मजदूरों एक हो, दुनिया के मजदूरों एक हो!"

मैं : जोई, ये कौन भाषण दे रहा है?

जोई : ये कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (टी) के राष्ट्रीय महासचिव हैं, कामरेड नायर। चलो मैं तुम्हें उनके दर्शन कराता हूँ।

जोई मुझे झुरमुट के किनारे ले जाता है। वहां डाइनिंग हॉल है जिसकी खिड़की झुरमुट की और खुलती है। लगता है कार्यक्रम ख़त्म हो चुका है, क्योंकि कामरेड नायर और कुछ दूसरे कामरेड डाइनिंग टेबुल पर आकर बैठ जाते हैं।

कामरेड नायर का वार्तालाप झुरमुट में सुना जा सकता है। हम पेड़ों की आड़ ले कर उनकी बातें सुनते हैं।

कामरेड नायर : लाओ भाई, बटर चिकेन, मटन, बेकन सब लगाओ, नान, पुलाव -  सब जल्दी लगाओ।

मैं जोई को, और जोई मुझे देखता है।

जोई : ये कामरेड अभी-अभी सही ही कह रहे थे कि जो वर्ग कमजोर होता है, असंगठित होता है, उसका शोषण करना मनुष्य की प्रकृति होती है। इनकी प्रकृति भी तो यही लग रही है।

मैं : कैसे?

जोई : जानवर इंसान से कमजोर होता है, और संगठित नहीं होता इसीलिए तो ये कामरेड उनका शोषण कर रहे हैं। अगर चिकेन, बकरे और सूवर संगठित हो कर नारे लगाते हुए जुलुस निकाल सकते और पुरजोर विरोध करते तो क्या इंसान उन्हें इतनी आसानी से मार कर उनका मांस खा पाते?

"बात तो सही है!", इतनी दूर तक तो अबतक मैंने सोचा ही नहीं। शायद कामरेड नायर ने भी नहीं सोचा हो। लेकिन सोचने लायक बात है।" मैं चिंतनशील हो जाता हूँ।

मैं : मैं कामरेड नायर के पास तुम्हारा सवाल जरूर रखूँगा।

जोई : विल्फ्रेड इसीलिए मैनिमल तैयार करने में लगे हैं कि कल को ये भी जुलुस निकाल कर इंसानों के जुल्म का विरोध कर सकें। अन्याय का विरोध नहीं कर चुप रहना मौत को निमंत्रण देने के बराबर होता है।

मगर अभी यहाँ हमारा रुकना सुरक्षित नहीं है। आज यहाँ काफी चहल-पहल है। ये लोग झुरमुट की ओर चिड़ियों की प्रदर्शनी देखने अगर आ गए तो बंटाधार हो जायेगा। चलो, निकल चलते हैं। मगर कामरेड नायर से आज मुझे एक अच्छा नारा मिल गया है - 'दुनिया के जानवरो, एक हो!' थैंक यू, कामरेड! और कामरेड, अगर आप श्रम की गरिमा की बात करते हो तो बैलों द्वारा खेतों में हज़ारों वर्षों से किये गए श्रम को याद करना, आपके धोबी के गधों द्वारा हज़ारों वर्षों से आपके कपड़े ढोने में की गयी मशक्कत का स्मरण करना, ऊंटों द्वारा रेगिस्तानों आदमियों और सामानों को ढोने में की जा रही मेहनत को भी न भूलना, और फिर सोचना कि क्या इन जानवरों को उनके श्रम के लिए तुमने उचित आदर दिया?

"कितना चिंतनशील और पर्सेप्टिव है यह जानवर", मैं सोचता हूँ। "और कितनी सही बातें कर रहा है!"

जोई और मैं फिर किनारे से हो कर अपनी आकाश यात्रा पर निकल पड़ते हैं।

पी के सिद्धार्थ
28 अक्टूबर, 2016

Wednesday, 26 October 2016

इंसान और पशु पक्षी - भाग 8

इंसान और पशु-पक्षी (भाग 8)

पी के सिद्धार्थ
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(जंगल में शेरखान के साथ मीटिंग)

जोई : शेरखान, आप अपनी लंच खा लें तो हम मीटिंग शुरू करें?

शेरखान : जरूर! खत्म ही है, चलो शुरू करते हैं...(शेरखान अपने शिकार का बच खुचा अंश गटक कर डकार लेता है, फिर थोड़ी गंभीर मुद्रा में बैठ जाता है।)

शेर खान : मुद्दा यह था कि हम दुनिया के ज्यादातर लोगों की यह धारणा कैसे दूर करें कि जानवरों में आत्मा नहीं होती, इसलिए उनकी क़ुरबानी देने या उन्हें खाने-पकाने में कोई हर्ज़ नहीं।

मैं : क्या मतलब? कौन कहता है कि जानवरों में आत्मा नहीं होती?

शेरखान : सारे सेमेटिक धर्म और उनपर आँख मूंद कर विश्वास करने वाले यही मानते हैं - यानि यहूदी धर्म, ईसाई धर्म और इसलाम धर्म। यह बड़ा अजीब विचार है! उनके अनुसार जानवर स्वर्ग या नर्क नहीं जाते, क्योंकि उनमें आत्मा ही नहीं होती। इनमें से कुछ तो पहले  यह भी मानते थे कि औरतों में भी आत्मा नहीं होती! हम जानवरों में इंटेलिजेंस, भावनाएं सभी कुछ तो है, भले ही इंसानों से कम हो! हमारे शरीर में भी दिल, जिगर, किडनी, स्नायुतंत्र, फेफड़े, मस्तिष्क की संरचना आदि सभी कुछ तो मनुष्यों जैसी ही है, कम-से-कम हममें से कुछ स्पीसीज में। हम भी इंसानों की तरह ही लालची होते हैं। फिर क्यों यह मान्यता है कि मनुष्यों में आत्मा होती है, मगर जानवरों में नहीं होती? हमें भी ख़ुशी होती है, और हमें भी पीड़ा होती है!

"उस इंसान को भी तो पीड़ा हुई होगी जिसे तुम अभी खा रहे थे! मगर तुम भी तो उसकी पीड़ा नहीं समझ रहे! बिलकुल इंसानों की तरह!", मैं मन ही मन सोचता हूँ मगर यह बात शेरखान को कहना इस वक्त खतरे से खाली नहीं।

जोई : बर्ट्रेंड रसेल ने इसीलिए, इन्हीं बेतुकी और अस्वीकार्य बातों के चलते, उस धर्म को त्याग दिया जिसमें वे पैदा हुए थे। उन्होंने अपनी किताब 'व्हाई आई एम नॉट अ क्रिस्चन' में लिखा कि यह निहायत बेतुकी बात है कि कुत्ते में आत्मा नहीं और आदमी में है। अगर है तो दोनों में है, नहीं है तो दोनों में किसी में भी नहीं।

मैं : धर्मो, ईश्वरदूतों और पैगम्बरों की कई बेतुकी बातों से लोगों को बचाने के लिए वैज्ञानिक चेतना और क्रिटिकल थिंकिंग को पाठ्यक्रम के माध्यम से स्कूलों-कॉलेजों में प्रसारित करने से ही इस तरह के अंधविश्वासों से लोगों को मुक्ति मिल पायेगी। लेकिन कुछ बेतुकी और गलत बातों के कारण समूचे धर्म का त्याग भी मुझे उचित नहीं लगता। कुछ कंकड़ों के चलते पूरे चावल को ही फेंक देना भी शायद उचित नहीं। कंकड़ों को चुन कर निकाल देना, और फिर चावल का उपयोग करना एक बेहतर विकल्प लगता है, अगर वह चावल खाने योग्य है।

जोई : विल्फ्रेड का मकसद यह था कि जब हर मुख्य स्पीसीज में कुछ आदमी की तरह सोचने वाले जीव के जोड़े तैयार हो जाएंगे, और उनके संयोग से सोचने वाले जींस के साथ नए बच्चे पैदा होंगे, तो बड़ी संख्या में इंसानों की पशु-विरोधी गतिविधियों का विरोध करने वाले समर्थ और इंटेलिजेंट पशु-समूह  खड़े हो कर मनुष्यों से अपनी रक्षा करने के तरीके निकाल पाएंगे। आज विल्फ्रेड के प्रयासों से काफी मैनिमल्स उन जीवों में तैयार हो गए हैं जिन्हें मनुष्य क़ुरबानी या भोजन के लिए प्रयोग में लाता है।

शेरखान : सिर्फ अपनी रक्षा? हुंह! यह विल्फ्रेड की मंशा होगी!हमारी नहीं!  मैनिमल्स की उचित संख्या होते ही हम मनुष्यों पर आक्रमण कर उन्हें तहस-नहस कर देंगे, खत्म कर देंगे। उनकी संख्या ही कितनी है? सिर्फ 740 करोड़! और हमारी संख्या कितनी है, जोई, कोई अनुमान?

"यहाँ भी वही हाल!", मैं सोचता हूँ।  "जितना पावर, उतना ही कम ज्ञान और उतना ही कम दिमाग लगाने की प्रवृत्ति!"

जोई : एक शोध के अनुसार एक एकड़ में 12.4 करोड़ से भी ज्यादा कीड़े मकोड़े होते हैं, यह वैज्ञानिकों ने ही शोध कर निकाला है।  सिर्फ पालतू पशुओं या लाइवस्टॉक की अनुमानित संख्या चौबीस सौ करोड़ से भी ज्यादा है, यानि मनुष्यों का साढ़े तीन गुना। इसमें सिर्फ चिकेन या मुर्गियों की संख्या ही 1800 करोड़ है। लेकिन दुनिया में सबसे अधिक कीड़े-मकोड़े हैं - एक एकड़ में 12.4 करोड़!

मैं इस मैनिमल कुत्ते की स्मृति पर हैरान हूँ। "यह तो जाकिर नायर का शागिर्द लग रहा है! कहीं नायर की तरह आंकड़े फेंक तो नहीं रहा?", मैं सोचता हूँ।

मैं : तुम्हारे आंकड़ों का श्रोत जोई?

जोई : लाइवस्टॉक के बारे में फ़ूड ऐंड ऐग्रिकल्चर ओर्गेनाइज़ेशन।

मैं : और धरती पर जानवरों की कुल संख्या ?

जोई : गणितशास्त्री कंप्यूटर विशेषज्ञ पशु अधिकार क्रियावादी ब्रियान टोमासिक के अनुसार 20 क्विंटिलियन।

शेरखान : इसका मतलब?

जोई : 20 बिलियन बिलियन!

शेरखान कन्फ्यूज़्ड और अवसादग्रस्त दिखता है, वैसे ही जैसे भारत में कम पढ़े-लिखे मंत्री पढ़े-लिखे ब्यूरोक्रेट्स की कुछ बातों को नहीं समझ पाने पर अपनी प्रतिष्ठा की हिफाज़त करने के लिए पूछ भी नहीं पाते और बात समझ भी नहीं पाते और अंततः फ़ाइल में मजबूर हो कर प्रस्ताव पर दस्तखत कर देते हैं।

"वही हाल यहाँ भी!", मैं फिर सोचता हूँ, "जितना अधिक पावर, उतना ही कम दिमाग, उतना ही कम ज्ञान!"

शेरखान : अच्छी संख्या में मैनिमल्स तैयार हो कर अगर अन्य जानवरों को नेतृत्व प्रदान कर दें तो 740 करोड़ मनुष्यों का सफाया तो एक दिन में हम जानवर कर दें! गुर्रर्रर! कीड़े मकोड़े ही चाहें तो एक साथ आक्रमण कर इंसानों को ख़त्म कर दें।

"अल बगदादी शेर खान से मिल कर बहुत खुश होगा", मैं सोचता हूँ। "इसकी सोच बगदादी से काफी मिलती है!"

शेर खान : फिर हमें एक दिन तो दुनिया का सबसे स्वादिष्ट भोजन मिलेगा - मनुष्यों का मांस! अहा, क्या सुन्दर दिन होगा वह!

शेर खान की बात सुन कर बाकी शेर मेरी ओर ललक भरी दृष्टि से देखते हैं। मैं हनुमानचालीसा का पाठ मन ही मन करना शुरू कर देता हूँ और चर्चा को गलत दिशा में जाता देख हस्तक्षेप करता हूँ।

मैं : शेर खान, फिर तो वही गलती हो गयी जो इंसान कर रहे हैं। दुनिया सभी की हैं, सभी को यहाँ रहना चाहिए। बायो-डाइवर्सिटी जरूरी है न!

जोई : शेर खान, हम कुछ मैनिमल्स की एक मीटिंग रखें जिसमें पशुओं से जुड़े और मुद्दों पर भी गंभीर चर्चा हो। तब विस्तार में बातें करेंगे। अभी हमें इजाज़त दो!

जोई मुझे लेकर ऊपर उठता है और कोई 20 फीट ऊपर पेड़ पर बैठ जाता है।

जोई : शेर खान, तुम तो मैनिमल हो, यानि आधे आदमी हो गए हो। इंसानों में आज कल जेंडर जस्टिस की बात बहुत चल रही है। थोडा तुम भी समझो। मैंने सुना है की नर शेर बड़े आलसी होते हैं, सिर्फ बैठे ही रहते हैं, और सारा काम मादा शेरनी से ही कराते हैं। यहां तक कि उसके लिए शिकार कर के पशु लाना और बच्चों का पालन पोषण और रक्षा भी शेरनी ही करती है। यह अच्छी बात नहीं है। मनुष्यों में आज बिहार के अलावा दुनिया में कहीं भी नर मानव इस तरह के आलसी नहीं होते कि खुद पड़े रहें और स्त्री बहार-भीतर के सारा काम दिन-रात करती रहे।

शेरखान उठ कर जोई की शरारत समझ कर मुस्कुराता हुआ गुर्राता है, और उसपर लपकने की मुद्रा बनाता है, मगर दो शेरनियां उसे ढेर कर देती हैं। इधर जोई मुझे ले कर फिर आकाश में हो लेता है। मैं समझ गया हूँ कि आज जोई ने चतुराई के साथ एक तीर से दो गंभीर शिकार किये हैं। मगर मैं असहाय हूँ। अगर उसका गला दबाने की कोशिश करता हूँ तो छूट का नीचे गिर जाऊंगा!

पी के सिद्धार्थ
26 अक्टूबर, 2016

Saturday, 22 October 2016

इंसान और पशु पक्षी : भाग 6

इंसान और पशु पक्षी : भाग 6

पी के सिद्धार्थ
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जोई और मैं अंधकार में आकाश-मार्ग से बढ़े जा रहे हैं। तभी मुझे क्षितिज पर थोड़ा प्रकाश दिखता है। लगता है सुबह होने वाली है। समुद्र का किनारा भी दिख रहा है। मेरे हाथ भी थोड़े थक गए हैं। इसलिए मैं जोई को सी-बीच पर उतरने को कहता हूँ। हम धीरे-धीरे ऊंचाई से सी-बीच पर लैंड कर जाते हैं। सूरज का लाल बिम्ब समुद्र से उठता हुआ दिखता  है। सुहानी शीतल हवा चल रही है।

मैं वार्तालाप को आगे बढ़ाता हूँ।

मैं : देखो जोई, मैं इंसानों के बीच काम करता हूँ। मैं जानवरों से सम्बंधित अधिक जानकारी नहीं रखता।

जोई : मगर मैं जानवरों के विषय में सोचता हूँ और जानकारी रखता हूँ। तुम जानवरों का भला चाहते हो इसलिए तुन्हें जानकारी दे रहा हूँ।
यह बताओ कि दुनिया की सबसे विकसित सभ्यता या विकसित देश आज किसे मानते हैं?

मैं : शायद अमेरिका ... मेरा मतलब है यू एस ए।

जोई : वहां मनुष्यों की जनसंख्या कितनी होगी?

मैं : शायद 32 करोड़। क्यों, तुम मेरे सामान्य ज्ञान की परीक्षा लेना चाहते हो?

जोई : ये 32 करोड़ 'विकसित' लोग  नौ सौ करोड़ से भी अधिक पशु-पक्षी एक साल में खा जाते हैं।

मैं : असंभव! सरासर गलत! तुम ये अनाप-शनाप डेटा कहाँ से ला रहे हो, जोई? तुमपर मनुष्यों की, खास कर अमेरिकन लोगों की, मानहानि का मुकदमा चल जायेगा, अगर तुम्हारे इस दुष्प्रचार का पता अमरीका को चल गया!

जोई एक मिनट के लिए मुझे हैरत की नजर से देखता है।

जोई : देखो, आखिर तो तुम मनुष्य ही हो न! मनुष्यों पर लांछन लगते ही कितने उद्विग्न हो गए? इतने उद्विग्न पशुओं पर अत्याचार से भी नहीं होते होगे! मैं तो समझता था कि तुम एक निष्पक्ष इंसान हो!

मैं : (शांत हो कर) देखो जोई, पूरी धरती पर सिर्फ  साढ़े सात सौ करोड़ इंसान हैं। इनसे भी बड़ी संख्या में पशु-पक्षियों को 32 करोड़ लोग अगर एक साल में मार कर खा जाएं, तो यह बात प्रथमदृष्ट्वा हजम नहीं होती। मैंने इसीलिए ऐसा कहा। तुम आंकड़ों का श्रोत बताओ, मैं स्वीकार कर लूंगा।

जोई : मैं अपनी स्मृति से बोल  रहा था। लेकिन मैं अभी ऑनलाइन चेक कर सटीक आंकड़े श्रोत के साथ बताता हूँ।

जोई आँखें बंद कर लेता है। पलकों पर पुतलियों का कम्पन दिख रहा है। शायद ब्रेन में ऑनलाइन गतिविधि चल रही है।

जोई : सटीक आंकड़े हैं 9.2 बिलियन। यानि नौ सौ बीस करोड़। वर्ष 2015, श्रोत USDA, यानि यूनाइटेड स्टेट्स डिपार्टमेंट ऑफ़ एग्रीकल्चर।

मैं : मगर कोई कृषि-विभाग पशुवध के आंकड़े कैसे दे सकता है?

जोई : अमेरिका में, और अब अन्यत्र भी, पशु-पक्षियों को बड़ी संख्या में आदमियों के खाने के लिए पैदा करने और तैयार करने को भी 'फार्मिंग' के ही अंतर्गत गिनते हैं। अब उनकी विशाल संख्या में 'फैक्ट्री फार्मिंग' होती है।

तभी एक ओर से एक गाय और एक खरगोश हमारे पास पहुँचते हैं। वे जोई को पहचानते हैं। 'हेलो जोई, कैसे हो?'

जोई : अच्छा हूँ, तुम लोग कैसे आ गए यहाँ?

खरहा : हमें इंट्यूशन हो रहा था कि तुम हमारे करीब हो। फिर हमने जी पी एस चिप से तुम्हारा लोकेशन चेक किया।

गाय : ह्म्म्म्म!

जोई : (मेरी ओर इशारा कर के) इनसे मिलो, ये मेरे पापा हैं। मैं इन्हें जानवरों की हालत दिखाने ले कर निकला हूँ।

और पापा, ये भी मैनिमल हैं, जिन्हें विल्फ्रेड ने अपनी प्रयोगशाला में रसेल की बौद्धिक जींस लगा कर तैयार किया था। ये भी सोच सकते और बातें कर सकते हैं।

खरहा : महाशय, आपलोगों की बातें हम कुछ देर से सुन रहे हैं। मगर माफ़ करना जोई, तुमने जो आंकड़े दिए उनमें अमेरिका में भोजन के लिए मारे जाने वाले खरगोशों की संख्या शामिल नहीं। 2015 में अमरीका में बीस लाख खरगोश भी मार कर खाये गए।

तभी समुद्र से एक डॉल्फिन मछली निकल कर आती है।

डॉलफिन : हेलो जोई!

जोई : हेलो! अरे, तुम भी यहीं?

डॉलफिन : हाँ। मुझमे रसेल की बौद्धिक जीन्स लगा कर विल्फ्रेड ने पानी में छोड़ दिया यह कह कर कि अपने जैसी थिंकिंग डॉल्फ़िन खूब पैदा करो। उसने और साधारण मछलियाँ भी समुद्र में थिंकिंग जींस लगा कर छोड़ी हैं।

जोई : ग्रेट! विल्फ्रेड बहुत बड़ा काम कर रहे हैं। ईश्वर उन्हें सफलता दे!

डॉल्फ़िन : मैं बताना चाहती हूँ कि अमेरिका के कृषि-विभाग के आंकड़ों में खाई जाने वाली मछलियों की संख्या भी शामिल नहीं है। मुझे लगता है दुनिया में सबसे ज्यादा मछलियाँ ही खाई जाती हैं। (क्रमशः)

पी के सिद्धार्थ
23 अक्टूबर, 2016

Sunday, 16 October 2016

इंसान और पशु-पक्षी भाग 4

इंसान और पशु पक्षी : भाग 4

पी के सिद्धार्थ
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मैं और जोई आकाश मार्ग से उड़े जा रहे हैं। सहसा जोई मुझे ले कर एक मंदिर में उतर जाता है। मैं चाँद के प्रकाश में देख सकता हूँ कि यह एक जैन मंदिर है। जोई मंदिर की ऒर मुख कर पीछे के पैर पीछे और आगे के पैर आगे फैलाकर बिलकुल लंबा हो जाता है, जैसे साष्टांग प्रणाम कर रहा हो। फिर अपने पैर समेट कर वह मुझसे मुखातिब होता है।

जोई : पशु-पक्षी जिस धर्म को सबसे अधिक आदर देते हैं, वह जैन धर्म है। पशु-पक्षियों के प्रति इतना आदर और रक्षा-भाव किसी दूसरे धर्म में नहीं। ये लोग शाम को ही भोजन कर लेते हैं ताकि अंधकार में कीड़े-मकोड़े गलती से भोजन के साथ अंदर न चले जाएं। इनके संत मुख पर सफ़ेद पट्टियां बांध कर रखते हैं ताकि सांस के माध्यम से कोई छोटे जीव इनके अंदर प्रवेश कर क्षतिग्रस्त न हों।

वास्तव में भारत में पैदा हुए लगभग सभी धर्म पशुओं को बहुत आदर और प्रेम देते हैं। जितने ऐसे पशु-पक्षी हैं जिन्हें मनुष्यों ने अन्धविश्वास या उनसे होने वाले खतरों के कारण नुकसान पहुँचाना  शुरू किया उन सभी की रक्षा करने के लिए हिन्दू ऋषियों ने किसी-न-किसी देवी या देवता का वाहन या संगी बना दिया।

"जैसे?", मैं पूछ कर उसके ज्ञान की परीक्षा लेता हूँ। मुझे यह भान हो रहा है कि जोई जानवरों के अंतर्राष्ट्रीय संगठन का महासचिव बनने की क्षमता रखता है।

जोई : जैसे उल्लू को लक्ष्मी की सवारी बना दी: सांप को भगवान शिव के गले में लपेट दिया ताकि लोग साँपों को भी जीने दें और मारने से कतराएं। नागपंचमी-जैसे पर्व बना कर नाग-पूजा का विधान बना दिया। जिस पशु ने आदमी की अब तक सबसे ज्यादा मदद की - अपना दूध पिला कर - उसे माँ का दर्जा दे कर उसका ऐसा आदर किया कि ऐसा उदहारण कहीं पूरी दुनिया में नहीं मिलता।

मैं : ("जानवरों को इतना आदर दिया, मगर मनुष्यों के एक वर्ग को उनकी मदद और सेवा के बदले आदर क्यों नहीं दे पाये ये हिन्दू?", मैं मन-ही-मन सोचता हूँ।) मगर वैदिक कर्मकांड और यज्ञ में कभी-कभी पशुबलि भी तो हिंदुओं ने दी।

जोई : कुछ दिन वैदिक काल में यह परंपरा रही, मगर उसका विरोध भी हुआ, और वह रुक भी गयी।

मैं : मगर दुर्गा-काली के मंदिरों में तो अभी भी पशु-बलि चलती ही है।

जोई : इसे हिन्दूधर्म पर हम जानवर एक काला धब्बा मानते हैं। इसीलिए तो मैं तुम्हें सबसे पहले जैन-मंदिर में लाया।

...और तुमने 2011 की भारत की जनगणना के परिणाम देखे?

मैं : कौन-से परिणाम?

जोई : कि भारत में किस धर्म के लोग 70 साल से अधिक सबसे बड़ी संख्या में जीते हैं?

मैं : याद नहीं आ रहा। मगर तुम इतना ज्ञान कैसे रखते हो? तुम्हारे पास बुद्धि और सोच  की उच्चतम कोटि की जीन्स हैं, यह तुमने बताया। मगर थिंकिंग या इंटेलिजेंस की जीन्स तुम्हें बिना पढ़े-लिखे इतनी सूचनाएं तो नहीं दे सकतीं!

जोई : मेरे दिमाग में चिप्स लगायी गईं जो मुझे ऑनलाइन समाचारपत्रों और विकिपीडिया से जोड़ कर रखती हैं। मेरे एक ब्रेन-चिप में पूरी इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका और इनसाइक्लोपीडिया अमेरिकाना इंस्टॉल्ड हैं।

इस जानवर को देखते-सुनते मेरी हैरानी लगातार बढ़ती ही जा रही है। यह कमबख्त तो मुझसे भी अधिक इन्फर्मेशन अपने दिमाग में कैरी करता है!

मैं : तो 2011 की जनगणना के परिणाम क्या बताते हैं लंबे जीवन के बारे में?

जोई : कि जैन लोगों के बीच भारत में सबसे अधिक सेप्टुअजेनेरियन्स हैं?
वह कुछ देर चुप रह कर मेरी ओर ऐसी निगाह से देखता है जैसे भांप रहा हो कि मैंने उसके द्वारा प्रयुक्त अंग्रेजी शब्द का मतलब समझा या नहीं समझा।

मैं : मगर इससे क्या निष्कर्ष निकलता है कि जैनियों में सबसे ज्यादा सत्तर वर्ष से ऊपर के लोग हैं?

जोई : यही कि जो पशु-पक्षियों का मांस नहीं खाते वे, बाकी परिस्थितियों के सामान रहने पर, मांसाहारियों की अपेक्षा अधिक दिन जीते हैं। जैन लोग सबसे अधिक शाकाहारी होते हैं, और इसीलिए लंबा जीते हैं।

मैं  भी जैन मंदिर में नतमस्तक होता हूँ। महात्मा महावीर और अन्य जैन तीर्थंकरों के प्रति मेरी अगाध श्रद्धा उमड़ती है।

जोई मुझे आकाश मार्ग से फिर एक चर्च में ले जाता है। हम चर्च के प्रांगण में उतरते हैं।

मैं : अब मुझे इस चर्च में क्यों ले आए, जोई?

जोई : यह सामान्य चर्च नहीं है। यह सेवेंथ डे अड्वेंटिस्ट्स चर्च है।

मैं : सुना नहीं कभी।

जोई : यह ईसाइयत की एक शाखा है। बाइबिल में शाकाहार के लिए समर्थन साधारणतः नहीं पाया जाता। मगर 19वीं सदी में एक महिला ईसाई पैगम्बर हुईं एलन वाइट। उन्हें एक दिन ईश्वर ने यह ज्ञान प्रकट किया कि पशु-मांस मनुष्य के लिए बिल्कुल उपयुक्त नहीं है। यह उसे शारीरिक रूप से बीमार करता हैं, बौद्धिक और नैतिक रूप से कमजोर करता है और नीच पाशविक वृत्तियों को जगाता है। इसीलिए इस चर्च के अनुयायी ईसाई मांस-मछली नहीं खाते। एक सर्वेक्षण में यह सामने आया कि ईसाइयों के बीच सबसे लंबी उम्र इसी चर्च को मानने वालों की होती है।

मैं : बुद्ध के बारे में तुम्हारा क्या विचार है, जोई?

जोई : बुद्ध के ह्रदय में जानवरों के लिए अपार करुणा थी। मगर एक घटना ने बाद में बुद्ध के कुछ अनुयायियों को मांस खाने का बहाना दे दिया। बुद्ध एक ही बार खाते थे। वह भी भिक्षा में मिला हुआ भोजन। अपनी दोनों हथेलियों को जोड़ कर कटोरा बनाते थे और जितना उसमें अटता था उतना ही खाते थे।  एक दिन उनके इस कटोरे में किसी ने भिक्षा में मांस डाल दिया। लोग साधारणतः उन्हें निरामिष भोजन ही भिक्षा में देते थे, और बुद्ध मांस खाने की सोच भी नहीं सकते थे। मगर उन्होंने उस दिन भिक्षुक का धर्म समझ कर वह मांस खा लिया। हम जानवरों की निगाह में उन्होंने बड़ी भूल कर दी। उन्हें उस दिन भूखे रह जाना चाहिए था। इस दृष्टान्त का गलत मतलब निकाल कर कुछ बौद्ध सम्प्रदाय के लोग यह मानने लगे कि अगर जानवर को उन्होंने नहीं मारा, और उनके लिए ही वह जानवर नहीं मारा गया, तो उसका मांस खाया जा सकता है।

मैं : और मुसलमानों के बारे में तुम्हारा क्या ख्याल है?

जोई :  ह्म्म्म्म! (जोई थोडा चिंतित और भयभीत दिखता है।) उनके भी जानवरों के बारे में वे ही ख्याल हैं जो दूसरे सेमेटिक धर्मों के हैं : जानवर आदमी के खाने-पीने के लिए ही ईश्वर ने बनाये हैं। मगर मुसलमानों से जानवर सबसे ज्यादा भयभीत रहते हैं।

मैं : क्यों?
(क्रमशः)

पी के सिद्धार्थ
17 अक्टूबर, 2016