साम्प्रदायिकता : (भाग 2)
अपने धर्मपंथ की श्रेष्ठता की धारणा और साम्प्रदायिकता के बीच की विभाजन रेखा।
पी के सिद्धार्थ
अध्यक्ष, भारतीय सुराज दल
www.suraajdal.org
www.bharatiyachetna.org
www.pksiddharth.in
क्या यह सोचना या मानना कि मेरा धर्मपंथ (रिलिजन या मजहब) बाकी धर्मपंथों से श्रेष्ठ है, एक सांप्रदायिक विचार है?
मेरे मत में यह विचार की स्वतंत्रता है, 'फ्रीडम ऑफ़ थॉट' है। हर व्यक्ति को विचार रखने का हक़ है। इसे सांप्रदायिक विचार कहना उचित नहीं होगा। सम्भव है कि एक धर्म 'क' को सर्वश्रेष्ठ मानने वाले किसी व्यक्ति का विचार वाकई सत्य हो!
यह भी हो सकता है कि क, ख, और ग - इन तीनों धर्म-पंथों के लोग इस विचार को बिना नफरत की भाषा का प्रयोग किये मौखिक या लिखित अभिव्यक्ति दें कि उनका धर्म सर्वश्रेष्ठ है, और उसके कारण भी बताएं, और अपने विचारों का प्रचार भी दूसरों को प्रभावित करने के लिए करें। इसे भी साम्प्रदायिकता मनना मेरे मत में उचित नहीं होगा। कम-से-कम भारत का संविधान तो इसकी इजाज़त देता है। इसे अभिवक्ति की स्वतंत्रता या फ्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन कहेंगे। लेकिन इस विचार को अभिव्यक्ति देना कि दूसरे धर्म नितांत असत्य हैं, सिर्फ मेरा ही धर्म सत्य है, मेरे विचार से एक सांप्रदायिक कार्य होगा।
यदि अपने धर्म की श्रेष्ठता की अभियक्ति करने से आगे बढ़ कर कोई दूसरे धर्म पंथों के प्रति नफ़रत फैलाता है, या हिंसा में प्रवृत्त होता है, या उन्हें नुकसान पहुँचाने की कोशिश करता है, या जबरन किसी तरीके से दबाने का प्रयत्न करता है, तो यह भी निश्चित रूप से और निर्विवाद रूप से साम्प्रदायिकता कही जायेगी। लेकिन अगर वह किसी नफरत या हिंसा फ़ैलाने वाले धर्मपंथ या धर्मावलंबियों को नियंत्रित करने की, या उनसे अपनी या अपने धर्मपंथ की रक्षा करने की कोशिश करता है ताकि अपने धर्मपंथ और अपने धार्मिक समुदाय को जीवित और सुरक्षित रख सके तो यह एक उचित आत्मरक्षात्मक कार्रवाई होगी न कि साम्प्रदायिकता। उदहारण के लिए म्यांमार में एक धर्मपंथ की दबंगता और प्रतारणा से आत्मरक्षार्थ एक बौद्ध भिक्षु के नेतृत्व में एक हिंसक समूह खड़ा हो गया ताकि हिंसक तत्त्वों से शांतिप्रेमी बौद्ध समुदाय की रक्षा की जा सके, और वहां बौद्ध धर्म को जीवित रखा जा सके। इसे उन बौद्धों की साम्प्रदायिकता कहना उचित नहीं होगा।
ऊपर जो प्रथम दो बातें कहते हुए यह विचार बताया गया कि विचार की स्वतंत्रता या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को साम्प्रदायिकता नहीं कहेंगे, यह संगठनों और व्यक्तियों के सन्दर्भ में कहा गया, देश या 'स्टेट' के विषय में नहीं। अगर कोई राष्ट्र अपने संविधान या कानून के माध्यम से यह घोषित करता है की अमुक धर्म उसका राष्ट्र धर्म है, और राष्ट्र उसी धर्म के सिद्धांतों के अलोक में संचालित होगा तो यह साम्प्रदायिकता होगी, धर्म निरपेक्षता या सेक्युलरिज़्म नहीं।
स्टेट या राष्ट्र किसी धर्म-विशेष के साये में न चल कर रैशनल या तर्कसंगत सिद्धांतों के आधार पर चले, किसी धर्म का विशेष पक्ष न ले, सभी धर्मपंथों के साथ सामान बर्ताव करे, तभी उसे पूरी तरह सेक्युलर या धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र कहेंगे। (क्रमशः)
पी के सिद्धार्थ
8252667070
8 नवम्बर, 2016
No comments:
Post a Comment